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गोकुल: श्रीकृष्ण की पावन नगरी
उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद में स्थित गोकुल, भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं की पावन भूमि मानी जाती है। ब्रज क्षेत्र का यह स्थान सदियों से आस्था, भक्ति और मंदिरों का केंद्र रहा है।
प्राचीन समय में मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं होते थे, बल्कि वहां दान के रूप में संचित धन भी सुरक्षित रखा जाता था। यही कारण था कि विदेशी आक्रांताओं की नजर अक्सर मंदिरों पर रहती थी।
18वीं सदी का उथल-पुथल भरा दौर
लगभग 650 वर्ष पूर्व नहीं बल्कि 18वीं सदी में उत्तर भारत राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था। इसी काल में अफगानिस्तान का शासक अहमद शाह अब्दाली (जिसे अहमद शाह दुर्रानी भी कहा जाता है) ने भारत पर कई बार आक्रमण किए।
उसकी सेना का एक प्रमुख सरदार, सरदार खान, विशाल सैन्य बल के साथ ब्रज क्षेत्र की ओर बढ़ा। उस समय गोकुल और मथुरा समृद्ध धार्मिक नगर थे।
गोकुल पर हमला और नागा साधुओं का प्रतिरोध
जब सरदार खान की सेना गोकुल की ओर बढ़ी, तब संयोग से वहां नागा साधुओं का एक छोटा जत्था किसी धार्मिक सम्मेलन के लिए एकत्रित था।
नागा साधु केवल सन्यासी ही नहीं, बल्कि युद्धकला में भी पारंगत होते थे। इतिहास में कई बार उन्होंने धर्म और मंदिरों की रक्षा के लिए शस्त्र उठाए।
कहा जाता है कि संख्या में बहुत कम होने के बावजूद इन नागा साधुओं ने आक्रमणकारी सेना का डटकर सामना किया। हर एक साधु कई-कई सैनिकों पर भारी पड़ा।
युद्ध भीषण था। अनेक नागा साधु वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन उन्होंने आक्रमणकारियों को कड़ा प्रतिरोध दिया और भारी नुकसान पहुंचाया। इस संघर्ष ने यह संदेश दिया कि ब्रजभूमि केवल भक्ति की ही नहीं, बल्कि वीरता की भी भूमि है।
गोकुल आज भी क्यों खड़ा है?
इतिहास गवाह है कि ब्रज क्षेत्र ने कई आक्रमण झेले, लेकिन उसकी आस्था और परंपरा कभी समाप्त नहीं हुई।
नागा साधुओं के त्याग और बलिदान ने गोकुल की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके साहस ने यह सिद्ध किया कि जब धर्म और संस्कृति पर संकट आता है, तो साधु-संत भी योद्धा बन जाते हैं।
नागा साधु: तप और शौर्य का संगम
नागा साधु भारतीय सनातन परंपरा के ऐसे संन्यासी हैं जो:
- कठोर तपस्या करते हैं
- अखाड़ों से जुड़े होते हैं
- युद्धकला और शस्त्र विद्या में प्रशिक्षित होते हैं
- धर्म और तीर्थों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं
इतिहास में कई अवसरों पर नागा साधुओं ने मंदिरों और तीर्थ स्थलों की रक्षा की है।
निष्कर्ष
गोकुल पर हुआ यह आक्रमण केवल एक युद्ध नहीं था, बल्कि आस्था और आक्रमण के बीच संघर्ष था।
नागा साधुओं की वीरता आज भी ब्रज की मिट्टी में गूंजती है। उनके बलिदान की वजह से गोकुल अपनी आध्यात्मिक पहचान के साथ आज भी जीवित है।