भूमिका
भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता कहा जाता है। हर शुभ कार्य की शुरुआत गणेश जी की पूजा से होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गणेश जी के भी दो पुत्र हैं (भगवान गणेश के पुत्र) – शुभ और लाभ? इन दोनों का नाम ही जीवन के दो महत्वपूर्ण पहलुओं को दर्शाता है – सौभाग्य और समृद्धि। आइए जानते हैं इनकी पौराणिक कथा और महत्व।

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गणेश जी का विवाह – रिद्धि और सिद्धि
पुराणों के अनुसार गणेश जी का विवाह रिद्धि (समृद्धि का स्वरूप) और सिद्धि (सफलता का स्वरूप) से हुआ था।
- रिद्धि और सिद्धि, दोनों ब्रह्मा जी की पुत्रियाँ मानी जाती हैं।
- विवाह के बाद गणेश जी को दो संतानें प्राप्त हुईं – शुभ और लाभ।
शुभ और लाभ का जन्म
- शुभ का अर्थ है – मंगल, कल्याण और सौभाग्य।
- लाभ का अर्थ है – प्राप्ति, सफलता और उन्नति।
इन दोनों का जन्म इस प्रतीक के रूप में हुआ कि जो व्यक्ति अपने जीवन में शुभ कार्य करता है, उसे निश्चित रूप से लाभ प्राप्त होता है।
पौराणिक मान्यता
कहा जाता है कि जब देवताओं ने गणेश जी से आग्रह किया कि वे अपने भक्तों को केवल आशीर्वाद ही नहीं बल्कि सौभाग्य और समृद्धि भी प्रदान करें, तब गणेश जी ने अपने पुत्रों के रूप में यह दो शक्तियाँ – शुभ और लाभ – संसार को दीं।
- शुभ मानव के मन और विचारों को पवित्र और सकारात्मक बनाते हैं।
- लाभ उस सकारात्मकता का फल प्रदान करते हैं।
शुभ-लाभ का पूजन क्यों?
- नए घर में प्रवेश, व्यापार प्रारंभ या दीपावली के समय शुभ-लाभ का नाम लिखा जाता है।
- मान्यता है कि घर के मुख्य द्वार पर शुभ-लाभ लिखने से घर में शांति, धन और सौभाग्य का वास होता है।
- हर आरती के बाद गणेश जी के साथ-साथ शुभ-लाभ का भी स्मरण किया जाता है।
दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ
- जीवन में अगर कार्य शुभ होगा, तो उसका परिणाम निश्चित रूप से लाभकारी होगा।
- शुभ और लाभ हमें सिखाते हैं कि कर्म का फल हमारे कर्मों पर ही निर्भर करता है।
निष्कर्ष
भगवान गणेश के पुत्र शुभ और लाभ केवल पौराणिक पात्र नहीं हैं, बल्कि जीवन का गहरा संदेश देते हैं –
“जो शुभ करेगा, उसे ही लाभ मिलेगा।”
इसलिए हर शुभ कार्य की शुरुआत गणपति और उनके पुत्रों के स्मरण से करनी चाहिए।
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