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अकबर का फरमान और एक भक्त की अटूट आस्था
भारतीय इतिहास में अकबर को एक शक्तिशाली मुगल सम्राट के रूप में जाना जाता है। उनके शासनकाल में कई नियम और फरमान जारी होते थे, जिनका पालन करना प्रजा के लिए अनिवार्य था।
इसी कालखंड में एक ऐसा प्रसंग सामने आया जिसने भक्ति, साहस और विश्वास की नई परिभाषा गढ़ दी। यह कथा है श्री बिहारी दास महाराज जी की — जिनकी अटूट श्रद्धा ने स्वयं ईश्वरीय कृपा को प्रकट कर दिया।
अकबर का कठोर आदेश
एक दिन दरबार में घोषणा हुई कि कोई भी व्यक्ति अपने माथे पर भगवान का कोई चिन्ह लगाकर दरबार में उपस्थित नहीं होगा।
जो भी इस आदेश का उल्लंघन करेगा, उसका सिर कलम कर दिया जाएगा।
पूरे राज्य में भय का वातावरण फैल गया। लोग दहशत में थे। धार्मिक चिन्ह हटाने लगे। मंदिरों में भी चर्चा होने लगी — अब क्या होगा?
मां की चिंता और पुत्र की भक्ति
जब यह समाचार बिहारी दास महाराज जी के घर पहुँचा, उनकी माता अत्यंत चिंतित हो उठीं।
उन्होंने कहा:
“बेटा, कल से तिलक लगाकर मत जाना। समय ठीक नहीं है। अकबर ने साफ कह दिया है कि जो भी तिलक लगाएगा, उसका गला काट दिया जाएगा।”
लेकिन सच्चे भक्त के लिए ईश्वर का चिन्ह केवल एक परंपरा नहीं — आत्मा की पहचान होता है।
राधा रानी का दिव्य दर्शन
बिहारी दास महाराज जी ध्यान में बैठ गए। उन्होंने मन को पूरी तरह राधा रानी के चरणों में समर्पित कर दिया।
ध्यान गहरा हुआ। चिंतन में अद्भुत प्रकाश प्रकट हुआ।
उसी दिव्य अवस्था में राधा रानी साक्षात प्रकट हुईं।
उन्होंने अपने चरणों के अंगूठे से महाराज जी के तिलक को माथे से लेकर नाक तक खींच दिया — और वह तिलक अत्यंत लंबा और प्रभावशाली हो गया।
महाराज जी आनंद में डूबे रहे।
जब उन्होंने आँखें खोलीं — तो देखा कि वास्तव में उनका तिलक नाक तक बढ़ चुका है।
यह कोई स्वप्न नहीं था।
यह कृपा थी।
यह आशीर्वाद था।
यह भक्ति की विजय थी।
मृत्यु का भय बनाम भक्ति की शक्ति
अब प्रश्न था — क्या किया जाए?
महाराज जी ने निश्चय किया:
“अब चाहे सिर कट जाए, पर यह तिलक नहीं हटेगा। यह तो स्वयं राधा रानी के चरणों से बना है। इसे हटाना मेरे लिए असंभव है।”
यह साहस किसी साधारण व्यक्ति में नहीं होता।
यह उस भक्त में होता है जो शरीर से पहले आत्मा को पहचानता है।
अकबर के दरबार में
अगले दिन सैनिक उन्हें पकड़कर दरबार में ले गए।
अकबर ने कठोर स्वर में पूछा:
“क्या तुम्हें मेरा आदेश पता नहीं था?”
बिहारी दास महाराज जी ने शांत भाव से पूरी कथा सुनाई — राधा रानी के दर्शन से लेकर तिलक बढ़ने तक।
कुछ क्षण के लिए दरबार में सन्नाटा छा गया।
फिर अचानक अकबर जोर-जोर से हँसने लगे।
उन्होंने कहा:
“यह है सच्चा संत। यह है असली भक्त। जिसे मृत्यु का भय भी डिगा नहीं सकता।”
भक्ति की विजय
उस दिन के बाद यह लंबा तिलक एक पहचान बन गया।
यह केवल एक धार्मिक चिन्ह नहीं रहा — यह निर्भीक श्रद्धा का प्रतीक बन गया।
कहा जाता है कि तब से श्री हरिदास महाराज जी के परिकर (अनुयायी) चौड़े और लंबे तिलक को धारण करते हैं — उसी गौरव और उसी गर्व के साथ।
तिलक का आध्यात्मिक महत्व
तिलक केवल माथे पर लगाया गया चंदन या कुमकुम नहीं होता।
यह दर्शाता है:
- ईश्वर से जुड़ाव
- आत्मा की पहचान
- अहंकार का त्याग
- दिव्य संरक्षण
जब तिलक श्रद्धा से लगाया जाता है, तो वह केवल बाहरी चिन्ह नहीं — भीतरी शक्ति बन जाता है।
कथा से मिलने वाली शिक्षाएँ
- सच्ची भक्ति परिस्थितियों से बड़ी होती है।
- ईश्वर अपने भक्त की रक्षा स्वयं करते हैं।
- मृत्यु का भय भी श्रद्धा को नहीं तोड़ सकता।
- जो ईश्वर के चरणों में समर्पित है, वह संसार से नहीं डरता।
निष्कर्ष
यह कथा केवल इतिहास का प्रसंग नहीं — यह आस्था की ज्वाला है।
जब सत्ता ने प्रतिबंध लगाया, तब भक्ति ने साहस दिखाया।
जब भय ने घेरा, तब विश्वास खड़ा रहा।
और अंततः विजय हुई — श्रद्धा की।
आज भी जब कोई भक्त गर्व से लंबा तिलक लगाता है, तो वह केवल परंपरा नहीं निभाता — वह उस अमर कथा को जीवित रखता है जिसमें राधा रानी ने अपने चरणों से भक्त की लाज रखी थी।