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प्रस्तावना
क्या कभी आपने सोचा है कि क्या इंसान भगवान का दोस्त बन सकता है?
क्या भगवान सिर्फ पूजा, मंत्र और बड़े-बड़े अनुष्ठानों से प्रसन्न होते हैं?
या फिर एक छोटा सा करुणा का कार्य भी हमें भगवान के बहुत करीब ले जा सकता है?
आज जो कथा आप पढ़ने जा रहे हैं, वह केवल एक कहानी नहीं है। यह भक्ति का सार है। यह बताती है कि भगवान को पाने का मार्ग मंदिर के गर्भगृह से होकर नहीं, बल्कि दया, करुणा और सेवा से होकर गुजरता है।
यह कथा है एक साधारण व्यक्ति की…
एक छोटे से बच्चे की…
और उस अनदेखे स्पर्श की… जिसे हम कहते हैं – भगवान की लीला।
जून की तपती दोपहर और मंदिर का दृश्य
जून का महीना था।
आसमान आग बरसा रहा था।
धूप इतनी तेज कि जमीन पर पैर रखना मुश्किल हो रहा था।
शहर के बीचोंबीच एक पुराना मंदिर था। मंदिर में भीड़ थी। लोग दर्शन के लिए आ-जा रहे थे। कोई नारियल लेकर आया था, कोई फूल-माला, कोई प्रसाद।
मंदिर के बाहर मिठाई की एक दुकान थी। वहीं से लोग पेड़े और लड्डू खरीदकर प्रसाद चढ़ा रहे थे।
इन्हीं भक्तों में एक व्यक्ति भी था। साधारण कपड़े, सामान्य जीवन, कोई विशेष पहचान नहीं। वह मंदिर आया था भगवान के दर्शन करने।
वह मिठाई की दुकान पर खड़ा होकर पेड़े खरीद रहा था कि तभी उसकी नजर मंदिर के बाहर एक छोटे से बच्चे पर पड़ी।
तपती धूप में खड़ा वह बालक
लगभग 7–8 साल का बच्चा।
नंगे पैर।
हाथ में फूल-माला।
जमीन इतनी गर्म कि वह एक पैर पर खड़ा होता, फिर दूसरे पर।
कभी पहला पैर ऊपर, कभी दूसरा।
चेहरा पसीने से तर।
आंखों में उम्मीद।
वह हर आने-जाने वाले से कह रहा था —
“माला ले लो… भगवान के लिए माला ले लो…”
लेकिन लोग जल्दी में थे।
कोई देखता नहीं, कोई सुनता नहीं।
कुछ लोग मोलभाव करते, कुछ आगे बढ़ जाते।
वह व्यक्ति यह सब देख रहा था।
उसका हृदय विचलित हो उठा।
करुणा का क्षण
उस व्यक्ति से रहा नहीं गया।
उसने मिठाई वाले से कहा —
“भाई साहब, दो मिनट मेरा प्रसाद संभाल लेना। मैं अभी आता हूँ।”
वह बगल की दुकान पर गया।
वहाँ से उसने एक छोटी सी चप्पल खरीदी।
फिर वह उस बच्चे के पास गया।
उसने कहा —
“बेटा, ये लो… चप्पल पहन लो। धूप बहुत तेज है।”
बच्चे ने पहले तो आश्चर्य से देखा।
फिर धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।
और जो हुआ… वह उस व्यक्ति ने शायद जीवन में कभी नहीं सोचा था।
“आप कृष्ण हो ना?” – मासूम सवाल
बच्चे ने पूछा —
“आप कृष्ण हो ना?”
व्यक्ति चौंक गया।
“नहीं बेटा, मैं कृष्ण नहीं हूँ।”
बच्चा जिद पर आ गया —
“नहीं, सच बोलो। किसी को नहीं बताऊँगा। आप कृष्ण हो ना?”
“नहीं बेटा…”
बच्चा बोला —
“हो ही नहीं सकता कि आप कृष्ण ना हो। मैंने कल रात को कृष्ण से कहा था कि मेरे पैर धूप में जलते हैं। मुझे चप्पल दे दो। आज आप चप्पल लेकर आए हो। आप ही कृष्ण हो। झूठ बोल रहे हो।”
उस व्यक्ति की आँखें भर आईं।
भगवान का उत्तर किस रूप में आता है?
बच्चा बोला —
“अगर आप कृष्ण नहीं हो तो जरूर कृष्ण ने आपको भेजा होगा। आप उनके दोस्त हो।”
फिर उस बच्चे ने उस व्यक्ति के पैर छुए।
उस क्षण उस व्यक्ति को लगा जैसे भगवान ने उसे गले लगा लिया हो।
वह मंदिर दर्शन करने आया था।
लेकिन आज उसे मंदिर के बाहर ही भगवान मिल गए।
श्रीकृष्ण की लीला और भक्त का विश्वास
भक्ति का अर्थ केवल मंत्र जप नहीं है।
भक्ति का अर्थ है — विश्वास।
बच्चे ने रात को प्रार्थना की।
उसे विश्वास था कि श्रीकृष्ण उसकी सुनेंगे।
और सच में…
भगवान ने उसकी पुकार सुनी।
लेकिन स्वयं आकर नहीं।
एक इंसान के रूप में।
एक दयालु हृदय के माध्यम से।
क्या भगवान सच में सुनते हैं?
धार्मिक ग्रंथों में बार-बार कहा गया है —
“भगवान भाव के भूखे हैं।”
जब सुदामा खाली हाथ द्वारका गए थे, तो श्रीकृष्ण ने उन्हें गले लगा लिया था।
जब द्रौपदी ने पुकारा था, तो श्रीकृष्ण ने चीर बढ़ा दिया था।
जब मीरा बाई ने विष का प्याला पिया, तो वह अमृत बन गया।
तो क्या एक छोटे बच्चे की पुकार नहीं सुनी जाएगी?
सेवा ही सच्ची पूजा है
हम मंदिर जाते हैं।
प्रसाद चढ़ाते हैं।
घंटी बजाते हैं।
लेकिन क्या हमने कभी सोचा —
मंदिर के बाहर खड़े उस जरूरतमंद में भी भगवान हो सकते हैं?
गीता में श्रीकृष्ण ने कहा —
“जो मुझमें सबको और सबमें मुझे देखता है, वह मुझसे कभी दूर नहीं होता।”
भगवान को प्रसाद चढ़ाना अच्छा है।
लेकिन भगवान के बच्चे को चप्पल पहनाना —
यह उससे भी बड़ा पुण्य है।
भगवान के दोस्त कैसे बनें?
यह कथा हमें सिखाती है:
1. करुणा रखो
जहाँ दया है, वहाँ भगवान हैं।
2. अवसर पहचानो
भगवान रोज अवसर देते हैं —
किसी की मदद करने का।
3. सेवा करो
बिना दिखावे के।
4. विश्वास रखो
जैसे उस बच्चे ने रखा।
भगवान दोस्त क्यों बनाते हैं?
भगवान सबको मौका देते हैं।
हर दिन, हर पल।
वह देखते हैं —
कौन केवल पूजा करता है,
और कौन सेवा भी करता है।
जो सेवा करता है,
वही सच्चा भक्त है।
वही भगवान का मित्र बनता है।
निष्कर्ष – भगवान मंदिर में नहीं, हृदय में हैं
वह व्यक्ति मंदिर दर्शन करने गया था।
लेकिन उसे भगवान का साक्षात्कार बाहर मिला।
कभी-कभी भगवान मूर्ति में नहीं,
मासूम आंखों में मिलते हैं।
अगर आप भी भगवान के दोस्त बनना चाहते हैं —
तो अगली बार जब कोई जरूरतमंद दिखे,
समझ लेना —
कृष्ण आपको अवसर दे रहे हैं।
क्योंकि सच यही है —
भगवान दोस्त बनने का मौका सबको देते हैं।
अगर आपको यह कथा छू गई हो,
तो इसे शेयर करें,
कमेंट में लिखें — “जय श्री कृष्ण”
और अपने जीवन में कम से कम एक सेवा कार्य आज ही करें।
राधे राधे 🙏