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प्रस्तावना
हिंदू धर्म में भगवान शिव को “आशुतोष” कहा जाता है — अर्थात् जो तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं। वे “अवघड़ दानी” भी कहलाते हैं, क्योंकि वे बिना सोचे-समझे अपने भक्तों को वरदान दे देते हैं।
यह कथा उस दिव्य क्षण की है जब माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा कि आपकी कृपा किस पर और कैसे होती है? तब भगवान शिव ने उन्हें सच्चे भक्त और अभक्त का अंतर दिखाया।
यह कथा हमें सिखाती है कि शिव कृपा का अर्थ केवल धन-संपत्ति नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति है।
अभक्त के दर्शन
एक दिन भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा,
“चलो, आज तुम्हें अपने भक्त और अभक्त दोनों के दर्शन कराता हूं। पहले अभक्त को देख लो, तब भक्त के दर्शन से सच्चा सुख मिलेगा।”
दोनों संत वेश में पृथ्वी पर आए।
प्रातःकाल का समय था। एक धनी व्यक्ति अपने आंगन में बैठा सुपारी कतर रहा था। घर में गाय-भैंस बंधी थीं, दूध दुहा जा रहा था। वैभव और संपत्ति की कोई कमी नहीं थी।
भगवान शिव ने संत बनकर कहा —
“भगत जी, 100 ग्राम दूध दे दीजिए। शालिग्राम भगवान को स्नान कराना है।”
उस व्यक्ति ने तिरस्कार भरे शब्दों में उत्तर दिया। उसने दूध देने से इंकार कर दिया और संतों का अपमान किया।
यह देखकर माता पार्वती क्रोधित हो उठीं। लेकिन तभी भगवान शिव ने आशीर्वाद दिया —
“हे भगवान! इसकी संपत्ति और दुगुनी कर दो।”
माता पार्वती आश्चर्यचकित हो गईं —
“प्रभु! जिसने आपका अपमान किया, उसे और संपत्ति?”
भगवान शिव मुस्कुराए —
“जब इतनी संपत्ति में यह साधु का अपमान करता है, तो दुगुनी संपत्ति में यह और अधर्म करेगा और अपने कर्मों का फल भोगेगा। यही उसके लिए उचित है।”
सच्चे भक्त के दर्शन
अब दोनों एक फूस की झोपड़ी के पास पहुंचे।
वहां एक गरीब भक्त रहता था। उसके पास केवल एक गाय थी और उसी से उसका जीवन चलता था। झोपड़ी में उसकी वृद्ध माता भी रहती थी।
संतों को देखकर वह तुरंत साष्टांग दंडवत हो गया।
“आइए महाराज! मेरे भाग्य खुल गए।”
उसने श्रद्धा से 100-200 ग्राम दूध संतों को अर्पित किया।
भगवान शिव और माता पार्वती ने भगवत चर्चा की और फिर चलने लगे।
जाते समय भगवान शिव ने प्रार्थना की —
“हे करुणानिधान! इसकी गाय और माता दोनों को अपने पास बुला लो।”
यह सुनकर माता पार्वती अत्यंत व्यथित हो गईं।
“प्रभु! जिसने अपमान किया उसे संपत्ति, और जिसने प्रेम दिया उसकी गाय और माता को ले लिया?”
शिव कृपा का रहस्य
तब भगवान शिव ने कहा —
“जिस पर मैं विशेष कृपा करता हूं, उसे माया के बंधनों से मुक्त कर देता हूं।
इस भक्त का मन अपनी गाय और माता में बंधा हुआ है। यदि ये दोनों मेरे पास आ जाएंगे, तो उसका चित्त पूर्ण रूप से मेरे चिंतन में लीन हो जाएगा। वह संसार के मोह से मुक्त होकर मेरे स्वरूप में स्थित हो जाएगा।”
माता पार्वती ने सहमति में सिर झुका दिया।
कथा का आध्यात्मिक अर्थ
यह कथा हमें तीन गहरे संदेश देती है:
1️⃣ शिव कृपा हमेशा बाहरी रूप में नहीं दिखती
धन-संपत्ति मिलना ही कृपा नहीं है। कभी-कभी कष्ट भी कृपा का ही रूप होता है।
2️⃣ माया ही बंधन है
गाय, माता, धन, परिवार — ये सभी प्रेम के योग्य हैं, लेकिन जब आसक्ति बन जाते हैं, तो ईश्वर से दूरी बना देते हैं।
3️⃣ सच्चा भक्त परिस्थितियों से नहीं, भावना से पहचाना जाता है
भक्ति वैभव से नहीं, विनम्रता से होती है।
भगवान शिव क्यों कहलाते हैं आशुतोष?
भगवान शिव अत्यंत सरल और दयालु हैं। वे तुरंत प्रसन्न होते हैं और तुरंत वरदान दे देते हैं।
लेकिन उनकी कृपा का उद्देश्य केवल सांसारिक सुख देना नहीं, बल्कि आत्मा को उसके परम स्वरूप में स्थापित करना है।
निष्कर्ष
यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर की कृपा को केवल बाहरी घटनाओं से मत आंकिए।
कभी धन मिलना भी परीक्षा है, और कभी छिन जाना भी आशीर्वाद।
जिस पर भगवान शिव की सच्ची कृपा होती है, उसे वे माया से मुक्त करके अपने स्वरूप में स्थित कर देते हैं।