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पंढरपुर की सच्ची घटना: चोखा मेला और ठाकुर जी के केले
भारत की संत परंपरा में अनेक ऐसी कथाएँ मिलती हैं जो यह सिद्ध करती हैं कि भगवान के लिए जाति, ऊँच-नीच या सामाजिक स्थिति का कोई महत्व नहीं होता। भगवान केवल भाव देखते हैं। ऐसी ही एक अत्यंत मार्मिक और चमत्कारिक घटना जुड़ी है चोखा मेला से, जो विट्ठल मंदिर, पंढरपुर में घटित हुई मानी जाती है।
यह कथा केवल एक भक्त और भगवान की नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने वाली सच्चाई है।
चोखा मेला कौन थे?
चोखा मेला महाराष्ट्र के संत परंपरा के महान संतों में से एक माने जाते हैं। वे सामाजिक रूप से निम्न जाति में जन्मे थे, परंतु उनके हृदय में भगवान विट्ठल के प्रति अपार प्रेम था।
उनका जीवन सादगी, सेवा और भक्ति का प्रतीक था। वे दिन-रात भगवान का नाम जपते और पूर्ण समर्पण भाव से जीवन जीते थे।
बाजार से केले और भक्त का भाव
एक दिन चोखा मेला बाजार सब्जी लेने गए। वहाँ उन्होंने केले देखे। उनके मन में भाव आया—
“आज ठाकुर जी केला खाना चाहते हैं।”
उन्होंने केले खरीदे और सीधे मंदिर के बाहर पहुँच गए। उस समय उन्हें मंदिर के अंदर प्रवेश की अनुमति नहीं थी।
वे बाहर खड़े होकर पुकारने लगे —
“ठाकुर जी, केले खा लो… मैंने आपके लिए लाए हैं।”
यह पुकार किसी दिखावे की नहीं थी। यह एक सच्चे हृदय की पुकार थी।
अपमान और धक्का
मंदिर के पुजारियों और कुछ लोगों ने यह दृश्य देखा। उन्होंने उपहास किया—
“थोड़ा नाम जप लिया तो समझता है भगवान तेरे हाथ से केला खाने आएंगे?”
उन्हें धक्के देकर गिरा दिया गया। चोखा मेला अत्यंत दुखी हुए। वे घर लौट आए और रोते हुए बोले—
“मुझे निम्न जाति का समझकर अपमानित किया गया। प्रभु, मुझे यह शरीर नहीं चाहिए।”
रात का चमत्कार
रात हुई। तभी स्वयं विठोबा (विट्ठल भगवान) उनके घर आए।
भगवान ने पुकारा —
“चोखा मेला, केले तो खिलाओ। बहुत भूख लगी है।”
चोखा मेला ने आश्चर्य से कहा —
“अब क्यों आए हो प्रभु?”
भगवान बोले —
“मुझे पूरे दिन किसी और का भोग स्वीकार नहीं हुआ। मुझे तो तेरे हाथ के केले खाने थे।”
भक्त ने अपने हाथ से केले छीलकर भगवान को खिलाए। भगवान ने कुछ केले खाए और शेष लेकर कहा—
“ये मुझे दे दो, रुक्मिणी ने भी कुछ नहीं खाया।”
सुबह का रहस्य
अगली सुबह जब मंदिर के द्वार खुले तो पूरे आंगन में केले के छिलके पड़े थे। मंदिर में ताला लगा था। कोई अंदर नहीं गया था।
लोग हैरान थे।
किसी ने कहा —
“कल चोखा मेला आया था। शायद बदला लेने रात में घुस गया होगा।”
भीड़ उनके घर पहुँची और उन्हें बुरी तरह पीटा।
चोखा मेला रोते हुए कहते रहे —
“मैं नहीं गया। ठाकुर जी आए थे।”
मंदिर के द्वार बंद
जब लोग वापस मंदिर पहुँचे तो देखा कि मंदिर के द्वार अंदर से बंद थे, बिना ताले के। धक्का देने पर भी नहीं खुल रहे थे।
पुजारी ने प्रार्थना की —
“प्रभु, कौन सा अपराध हो गया?”
अंदर से आवाज आई —
“तुमने मेरे प्रिय भक्त को पीटा है। जब तक उसे सम्मान से पालकी में बैठाकर नहीं लाओगे, द्वार नहीं खुलेंगे।”
सम्मान के साथ वापसी
लोग फिर चोखा मेला के पास गए। माफी मांगी।
उन्होंने मना किया —
“मैं साधारण व्यक्ति हूं, पालकी में नहीं बैठूंगा।”
परंतु भगवान की आज्ञा याद थी।
लोगों ने उनके चरण पकड़े, प्रार्थना की।
अंततः उन्हें पालकी में बैठाया गया, ढोल-नगाड़ों के साथ मंदिर लाया गया।
चमत्कार
मंदिर के द्वार पर पहुँचकर चोखा मेला रो पड़े —
“प्रभु, द्वार खोल दीजिए।”
और तुरंत मंदिर के दरवाजे खुल गए।
यह घटना पंढरपुर में घटित मानी जाती है और आज भी भक्तों के बीच श्रद्धा से सुनाई जाती है।
इस कथा से मिलने वाली शिक्षाएँ
1. भगवान केवल भाव देखते हैं
जाति, पद, धन — कुछ भी मायने नहीं रखता।
2. सच्ची भक्ति में शक्ति होती है
भक्त की पुकार भगवान तक पहुँचती है।
3. अहंकार का अंत निश्चित है
समाज को अपनी गलती स्वीकार करनी पड़ी।
4. सम्मान ही सच्चा धर्म है
भगवान अपने भक्त का अपमान सहन नहीं करते।
निष्कर्ष
चोखा मेला की यह कथा केवल चमत्कार नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और सच्ची भक्ति का संदेश है।
भगवान मंदिर की दीवारों में सीमित नहीं हैं। वे वहां आते हैं जहां सच्चा प्रेम होता है।
जब भक्ति सच्ची हो, तो भगवान स्वयं भक्त के घर आते हैं — केले खाने भी।