हनुमान जी चिरंजीवी कैसे बने? – वरदान, श्राप और अमरत्व का अद्भुत रहस्य

प्रस्तावना

भारतीय सनातन परंपरा में कुछ दिव्य आत्माओं को चिरंजीवी माना गया है – अर्थात् जो युगों-युगों तक जीवित रहते हैं। उन महान आत्माओं में सबसे पूजनीय नाम है – हनुमान

लेकिन प्रश्न यह उठता है कि हनुमान जी चिरंजीवी कैसे बने?
क्या उन्हें अमरत्व जन्म से मिला था?
या फिर किसी विशेष घटना के कारण उन्हें यह वरदान प्राप्त हुआ?

इस लेख में हम जानेंगे –

  • इंद्र के वज्र प्रहार की घटना
  • देवताओं द्वारा दिए गए वरदान
  • ऋषियों के श्राप का रहस्य
  • और अंत में भगवान राम द्वारा दिया गया अमरत्व

बाल्यकाल की अद्भुत घटना – जब हनुमान जी सूरज को निगलने चले

एक बार बाल हनुमान ने आकाश में चमकते हुए सूर्य को लाल फल समझ लिया।
वे उसे खाने के लिए उड़ पड़े।

यह देखकर देवराज इंद्र चिंतित हो गए। यदि सूर्य ही निगल लिया जाता तो सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाता।

इंद्र ने क्रोधित होकर अपने वज्र से बाल हनुमान पर प्रहार किया।
वज्र उनके मुख (हनु) पर लगा और वे बेहोश होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।

इसी कारण उनका नाम पड़ा – हनुमान (जिसकी हनु पर आघात हुआ)।


वायु देव का क्रोध और देवताओं के वरदान

हनुमान जी के पिता वायु देव थे।
जब उन्होंने देखा कि उनके पुत्र पर वज्र प्रहार हुआ है, तो वे क्रोधित होकर समस्त वायु प्रवाह रोककर तपस्या में बैठ गए।

पूरी सृष्टि में प्राण संकट में पड़ गए।
तब सभी देवता बाल हनुमान को प्रसन्न करने और वायु देव को शांत करने आए।

उन्होंने हनुमान जी को अनेक वरदान दिए:

  • इंद्र: वज्र का प्रभाव कभी नहीं होगा
  • अग्नि: अग्नि आपको जला नहीं सकेगी
  • वरुण: जल आपको हानि नहीं पहुंचाएगा
  • यमराज: मृत्यु आप पर प्रभावी नहीं होगी
  • ब्रह्मा: कोई अस्त्र-शस्त्र आपको पराजित नहीं कर सकेगा

इन वरदानों से हनुमान जी अजेय बन गए।


मिला एक श्राप भी – अपनी शक्ति भूल जाने का

बाल्यकाल में हनुमान जी अत्यंत चंचल थे।
वे ऋषियों की तपस्या में विघ्न डाल देते थे।

तब कुछ ऋषियों ने उन्हें श्राप दिया –

“तुम अपनी दिव्य शक्तियों को तब तक भूल जाओगे,
जब तक कोई तुम्हें उनकी याद नहीं दिलाएगा।”

इसी कारण जब सीता जी की खोज का समय आया, तो जाम्बवान जी ने उन्हें उनकी शक्ति का स्मरण कराया।


राम जी से प्रेम – भक्ति का सर्वोच्च उदाहरण

जब राम का अवतार पूर्ण होने लगा और उन्हें बैकुंठ लौटना था, तब हनुमान जी अत्यंत व्याकुल हो गए।

वे बोले –
“प्रभु! या तो आप यहीं रहें, या मैं आपके साथ चलूँगा।”

राम जी मुस्कुराए।


अंगूठी वाली अद्भुत कथा

राम जी ने अपनी अंगूठी ज़मीन की दरार में गिरा दी और बोले –
“हनुमान, मेरी अंगूठी ले आओ।”

हनुमान जी सूक्ष्म रूप धारण कर धरती के भीतर चले गए।

वहाँ उनकी भेंट हुई शेषनाग से।

हनुमान जी ने अंगूठी के बारे में पूछा।
शेषनाग हँस पड़े।

उन्होंने पीछे देखने को कहा।
वहाँ उसी प्रकार की अंगूठियों का एक विशाल पहाड़ था।

शेषनाग बोले –
“हर युग में राम आते हैं, और हर बार हनुमान को इसी प्रकार अंगूठी लाने भेजते हैं। जब तक तुम लौटते हो, वे जा चुके होते हैं।”

इस कथा का अर्थ है –
सृष्टि चक्र अनंत है। राम और हनुमान का प्रेम भी अनंत है।


राम जी का अमरत्व का वरदान

जब राम जी बैकुंठ लौटे, तो उन्होंने जाते-जाते हनुमान जी से कहा –

“हे प्रिय भक्त!
जब तक मेरा अंतिम अवतार कल्कि नहीं आता,
तब तक तुम पृथ्वी पर रहकर धर्म की रक्षा करोगे।”

इसी के साथ हनुमान जी को चिरंजीव होने का वरदान मिला।


सप्त चिरंजीवी में हनुमान जी

सनातन धर्म में सात चिरंजीवी माने गए हैं:

  1. अश्वत्थामा
  2. महाबली
  3. वेदव्यास
  4. विभीषण
  5. कृपाचार्य
  6. परशुराम
  7. हनुमान

इनमें हनुमान जी को सबसे अधिक पूजनीय माना जाता है क्योंकि वे आज भी भक्तों की पुकार सुनते हैं।


हनुमान जी आज भी जीवित हैं?

मान्यता है कि जहाँ भी राम नाम का कीर्तन होता है, वहाँ हनुमान जी अवश्य उपस्थित होते हैं।

तुलसीदास जी ने भी संकेत दिया है कि वे आज भी भक्तों के बीच विद्यमान हैं।

कई संतों ने दावा किया है कि उन्होंने हनुमान जी के दर्शन किए।


आध्यात्मिक संदेश

हनुमान जी की कथा हमें सिखाती है:

  • शक्ति होने पर भी विनम्र रहना चाहिए
  • सच्ची भक्ति अमर बना देती है
  • ईश्वर भक्त को कभी नहीं छोड़ते
  • हर युग में धर्म की रक्षा के लिए दिव्य शक्तियाँ कार्य करती हैं

निष्कर्ष

हनुमान जी चिरंजीवी कैसे बने?

वे देवताओं के वरदान से अजेय बने,
ऋषियों के श्राप से विनम्र बने,
और राम जी के आशीर्वाद से अमर बने।

उनका अमरत्व केवल शरीर का नहीं, बल्कि भक्ति और सेवा भाव का अमरत्व है।

आज भी यदि सच्चे मन से “जय श्री राम” और “जय हनुमान” कहा जाए, तो माना जाता है कि हनुमान जी हमारी रक्षा करते हैं।

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