ईश्वरदास जी की अद्भुत भक्ति कथा: जब भगवान स्वयं खिचड़ी बनाने आए

प्रस्तावना: भक्ति का वह स्वरूप जो भगवान को विवश कर दे

भारतीय संत परंपरा में अनेक ऐसी कथाएँ मिलती हैं जहाँ सच्ची भक्ति ने स्वयं भगवान को भक्त के द्वार पर आने के लिए विवश कर दिया। जैसे सुदामा की कथा में मित्रता और भक्ति ने श्रीकृष्ण को दौड़कर गले लगाने को प्रेरित किया, वैसे ही ईश्वरदास जी की यह कथा त्याग, संतोष और निष्काम भक्ति की चरम सीमा को दर्शाती है।

यह कथा केवल गरीबी की नहीं है, यह कथा है उस अटल विश्वास की—जो कहता है कि “भगवान से केवल भगवान को मांगो, संसार की वस्तुएँ नहीं।”


ईश्वरदास जी का जीवन: निर्धनता में भी दिव्यता

ईश्वरदास जी अत्यंत दीन-हीन अवस्था में जीवन व्यतीत करते थे।
उनकी पत्नी और दो-चार छोटे बालक थे। घर में न अन्न था, न दाल, न चावल।

दिन ऐसे बीतते कि कभी भोजन मिलता, कभी नहीं।

एक दिन बालक भूख से व्याकुल होकर जोर-जोर से रोने लगे।

ईश्वरदास जी ने पत्नी से पूछा:

“बालक क्यों रो रहे हैं? इन्हें शांत कराओ।”

पत्नी की आँखों में आँसू थे।
वह बोली:

“घर में अन्न नहीं है… दाल नहीं… चावल नहीं… कैसे पवाऊँ इन्हें?”

यह सुनकर भी ईश्वरदास जी विचलित नहीं हुए।


खाली कढ़ाई और भरे हुए विश्वास का दृश्य

उन्होंने बच्चों को गोद में लिया, चूल्हा जलाया, कढ़ाई चढ़ाई और उसमें केवल पानी डाल दिया।

बच्चों से बोले:

“देखो बेटा, दाल पक रही है। जब तक तैयार होती है, चलो हरि नाम सुनो।”

वे बच्चों को हरि कथा सुनाने लगे।
भजन करते-करते बच्चे सो गए।

चूल्हे पर कढ़ाई में केवल पानी उबल रहा था।
पर उस घर में विश्वास उबल रहा था—अटूट, अडिग और निष्काम।


पत्नी का सुझाव: संकल्प करिए

पत्नी ने कहा:

“आप नित्य भक्ति संकल्प के साथ किया करिए।
ठाकुर जी से प्रार्थना किया करिए कि वे अन्न-धन दें।
हम उसका दशांश उनकी सेवा में लगाएंगे।”

पर ईश्वरदास जी का उत्तर अद्भुत था:

“मैं भजन करके भगवान से रोटी मांगूँ?
चाहे भूखा मर जाऊँ, पर अन्न-जल नहीं मांगूंगा।
यह सब प्रारब्ध से मिलने वाली वस्तुएँ हैं।
इनके लिए ठाकुर जी को क्यों परेशान करूँ?”

यह वाक्य भक्ति के उच्चतम शिखर का प्रमाण है।


भगवान का प्रकट होना

जब भगवान विष्णु ने यह दृश्य देखा—
खाली कढ़ाई, भूखे बच्चे, पर अटल विश्वास—
तो वे सह न सके।

शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर स्वयं प्रकट हुए।

ईश्वरदास जी ने दंडवत प्रणाम किया।

भगवान ने प्रसन्न होकर कहा:

“वरदान मांगो ईश्वरदास, क्या चाहिए?”


अद्भुत वरदान

ईश्वरदास जी ने जो माँगा, वह संसार में दुर्लभ है:

“प्रभु! मेरी पत्नी, मेरे बच्चों और मेरे चित्त में
आपसे कुछ मांगने की जो भी इच्छाएँ हैं,
वे सब समाप्त हो जाएँ।
हम केवल आपको देखें, आपको चाहें,
पर कुछ मांगें नहीं।”

यह सुनकर भगवान अति प्रसन्न हुए।


भगवान स्वयं बने रसोइया

भगवान ने ईश्वरदास जी को उठाया।
स्वयं चूल्हे पर बैठे।

अपने हाथों से खिचड़ी बनाई।

पत्नी, बच्चे और ईश्वरदास जी को प्रेमपूर्वक खिलाया।

जिस घर में अन्न का एक दाना नहीं था,
वहीं स्वयं भगवान ने भोजन परोसा।


बैकुंठ प्रस्थान

भोजन के पश्चात भगवान ने कहा:

“अब आपकी लीला पूर्ण हुई।
इस धरा पर आपका कार्य समाप्त हुआ।
चलो, हमारे साथ।”

पत्नी, बच्चे, ईश्वरदास जी—
यहाँ तक कि उनकी पतली-सी घोड़ी भी—
सबको भगवान ने मुक्ति प्रदान की।

और सबको लेकर बैकुंठ प्रस्थान कर गए।


कथा का आध्यात्मिक विश्लेषण

1️⃣ निष्काम भक्ति का सर्वोच्च आदर्श

ईश्वरदास जी ने कभी भक्ति को व्यापार नहीं बनाया।
न कहा—“हे भगवान, यह दो तो भजन करूंगा।”

उन्होंने कहा—

“मैं केवल आपको चाहता हूँ।”


2️⃣ प्रारब्ध पर विश्वास

उन्होंने स्पष्ट कहा—
अन्न, वस्त्र, मकान प्रारब्ध से मिलते हैं।
भगवान को केवल प्रेम से पुकारो।


3️⃣ संतोष का महत्व

आज मनुष्य धन में भी अशांत है।
पर ईश्वरदास जी निर्धन होकर भी संतुष्ट थे।


4️⃣ भक्ति जो भगवान को विवश करे

जब भक्ति सच्ची हो,
तो भगवान को आना ही पड़ता है।


आधुनिक जीवन के लिए संदेश

  • भक्ति को सौदा मत बनाइए
  • भगवान को वस्तुओं के लिए मत पुकारिए
  • विश्वास रखें—जो आवश्यक होगा, वह मिलेगा
  • भगवान को भगवान के लिए चाहें

निष्कर्ष

ईश्वरदास जी की कथा हमें सिखाती है कि
सच्ची भक्ति में मांग नहीं होती,
केवल समर्पण होता है।

जब भक्त कहता है—
“मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस आप चाहिए”
तब भगवान स्वयं खिचड़ी बनाने आ जाते हैं।

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