करौली के काले खान और श्री मदनमोहन जी की अद्भुत भक्ति कथा

🌸 करौली की पावन धरती और श्री मदनमोहन जी

राजस्थान के करौली नगर में विराजमान हैं दिव्य स्वरूप वाले श्री मदनमोहन जी मंदिर। यह मंदिर भगवान श्रीकृष्ण के अत्यंत सुंदर विग्रह के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं।

लेकिन इस मंदिर की महिमा केवल स्थापत्य या परंपरा में नहीं, बल्कि उन भक्तों की कथाओं में भी है, जिन्होंने अपने प्रेम से भगवान को बांध लिया। ऐसी ही एक कथा है काले खान की।


✉ काले खान – पेशे से डाकिया, दिल से भक्त

करौली में एक मुस्लिम परिवार में जन्मे काले खान पेशे से डाकिया थे। उनका काम था लोगों तक चिट्ठियाँ पहुँचाना। एक दिन डाकघर में एक पत्र आया – नाम लिखा था “मदन मोहन जी”।

काले खान को आश्चर्य हुआ – क्या भगवान के नाम भी चिट्ठी आती है?
जिज्ञासा वश वे वह चिट्ठी लेकर मंदिर पहुँचे।

उन्होंने पुजारी जी से पूछा –
“भाई साहब, मदन मोहन कौन हैं?”

पुजारी जी ने उत्तर दिया –
“हमारे ठाकुर जी हैं।”

काले खान ने आदर से वह चिट्ठी सौंप दी। उसी क्षण, जब वे पत्र दे रहे थे, उन्हें मंदिर के अंदर से ठाकुर जी की थोड़ी सी झलक मिल गई।

बस… वही क्षण उनके जीवन का मोड़ बन गया।


👁 एक झलक और जन्मों का प्रेम

वह झलक साधारण नहीं थी।
घुंघराले बाल, मोहक मुस्कान, अद्भुत आभा।

काले खान भीतर तक हिल गए। मन में विचार आया –
“ये तो बड़े सुंदर हैं… बड़े अद्भुत हैं…”

कहते हैं, जब कृष्ण किसी को अपने प्रेम में बाँध लेते हैं, तो उसके हृदय में एक दिव्य बेचैनी भर देते हैं।

वही बेचैनी अब काले खान के भीतर जाग चुकी थी।


📮 झूठी चिट्ठियाँ – सच्चे प्रेम का बहाना

अब समस्या यह थी कि वे दूसरे धर्म से थे। मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं थी।

लेकिन प्रेम कहाँ नियम मानता है?

काले खान ने एक उपाय निकाला।
उन्होंने स्वयं मदन मोहन जी के नाम झूठी चिट्ठियाँ लिखनी शुरू कर दीं।

सिर्फ इसलिए…
कि उस बहाने मंदिर तक जा सकें।
बाहर से ही सही, लेकिन एक झलक पा सकें।

यह छल नहीं था।
यह प्रेम की व्याकुलता थी।


💔 विरह की अग्नि

एक दिन काले खान की व्याकुलता चरम पर पहुँच गई।
उन्होंने मन ही मन कहा:

“प्रभु, मैं अंदर नहीं आ सकता…
पर आप तो बाहर आ सकते हो।
यदि आप मुझसे प्रेम करते हो तो एक बार दर्शन दो।
जब तक आप नहीं आओगे, मैं अन्न ग्रहण नहीं करूंगा।”

और वे घर पर ही उपवास करके बैठ गए।

एक दिन बीता।
दो दिन बीते।
तीन दिन बीत गए।

भूखे-प्यासे, अश्रुपूर्ण नेत्रों से वे केवल अपने ठाकुर को याद करते रहे।


🌙 जब भगवान स्वयं आए

कहते हैं, तीसरी रात एक अद्भुत घटना घटी।

एक सुंदर बालक उनके द्वार पर आया।
घुंघराले बाल।
मोटी-मोटी आँखें।
पीताम्बर धारण किए।
सिर पर मोरपंख।

हाथ में खीर से भरा एक पात्र।

वह बालक बोला –
“काले खान, लो… मैं आ गया। अब खा लो।”

यह कोई साधारण बालक नहीं थे।
स्वयं श्रीकृष्ण अपने भक्त के घर पधारे थे।

काले खान फूट-फूट कर रो पड़े।
भगवान ने अपने हाथों से उन्हें खीर खिलाई।


🌺 भक्ति का सच्चा संदेश

यह कथा हमें क्या सिखाती है?

✔ भगवान जाति नहीं देखते
✔ भगवान धर्म नहीं देखते
✔ भगवान केवल प्रेम देखते हैं

जैसे शबरी के जूठे बेर स्वीकार किए गए, वैसे ही काले खान का प्रेम भी स्वीकार हुआ।

भक्ति में दीवारें नहीं होतीं।
सच्चा प्रेम ईश्वर को भी नियम तोड़ने पर विवश कर देता है।


🕉 करौली की इस कथा का आध्यात्मिक महत्व

  1. प्रेम सर्वोपरि है – ईश्वर के लिए केवल हृदय की शुद्धता मायने रखती है।
  2. विरह ही मिलन का मार्ग है – जब तक तड़प नहीं, तब तक साक्षात्कार नहीं।
  3. धर्म से ऊपर भक्ति – ईश्वर का द्वार सबके लिए खुला है।

📿 निष्कर्ष

करौली के काले खान की यह कथा केवल एक कहानी नहीं, बल्कि मानवता और भक्ति का जीवंत उदाहरण है।

जब प्रेम सच्चा हो, तो भगवान स्वयं भक्त के द्वार आते हैं।

यदि आपके हृदय में भी सच्चा भाव है, तो निश्चय ही प्रभु आपके जीवन में भी किसी न किसी रूप में अवश्य प्रकट होंगे।


❓FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

Q1. काले खान कौन थे?
वे करौली के एक डाकिया थे जो श्री मदनमोहन जी के अनन्य भक्त बन गए।

Q2. क्या भगवान सच में उनके घर आए थे?
भक्ति परंपरा के अनुसार, भगवान ने बालक रूप में उन्हें दर्शन दिए और खीर खिलाई।

Q3. इस कथा का मुख्य संदेश क्या है?
ईश्वर के लिए प्रेम ही सर्वोपरि है, धर्म या जाति नहीं।

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