
Table of Contents
🌼 प्रस्तावना: निष्किंचन भक्ति की पराकाष्ठा
भक्ति के मार्ग में धन, वैभव, सत्ता और प्रतिष्ठा का कोई मूल्य नहीं होता। वहाँ केवल प्रेम चलता है — शुद्ध, निष्कलुष और निष्किंचन प्रेम। ऐसी ही प्रेममयी भक्ति का अद्भुत उदाहरण हैं कुंभन दास, जो पुष्टिमार्ग के अष्टछाप कवियों में से एक माने जाते हैं और वल्लभाचार्य के शिष्य थे।
उनकी भक्ति इतनी सरल और सच्ची थी कि स्वयं श्रीनाथ जी उनके घर आकर खेलते थे, उनसे बातें करते थे और उनकी गोद में बैठते थे।
यह कथा केवल एक संत की नहीं, बल्कि उस प्रेम की है जहाँ भगवान भक्त के अधीन हो जाते हैं।
🌿 पुष्टिमार्गीय तिलक और दर्पण की लीला
पुष्टिमार्ग में तिलक लगाना केवल एक धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि भगवान के स्वरूप को अपने मस्तक पर धारण करने का प्रतीक है। यह तिलक अत्यंत विशिष्ट होता है — इसे ठीक प्रकार से लगाने के लिए दर्पण की आवश्यकता होती है।
लेकिन कुंभन दास जी के घर में दर्पण नहीं था।
वे प्रतिदिन तिलक लगाने बैठते और उसी समय एक नन्हा बालक आकर उनकी गोद में बैठ जाता। वह बालक उनकी ठोड़ी पकड़कर कहता —
“हाँ कुंभना, मैं देख रहा हूँ, तू लगा स्वरूप लगा…”
कुंभन दास जी मुस्कुराते और कहते —
“हाँ लाला, यहीं से खींच लूँ ऊपर? अब नीचे तो नहीं घूम गया? बहुत सुंदर लगो मेरो कुमना…”
वह बालक कोई साधारण बालक नहीं था — वह स्वयं श्रीनाथ जी थे, जो उनके लिए दर्पण बनते थे।
यह लीला गोवर्धन की पावन भूमि पर घटित होती थी।
👑 राजा की संपत्ति और भगवान की परीक्षा
एक दिन ठाकुर जी ने विचार किया —
“मेरा कुंभना इतना अकिंचन है, झोपड़ी में रहता है। क्यों न उसे कुछ संपत्ति दिला दूँ?”
उन्होंने एक राजा को स्वप्न में आदेश दिया —
“गोवर्धन में कुंभन दास नाम के संत हैं। जाकर उन्हें अपनी संपत्ति दान कर दो।”
सुबह होते ही राजा करोड़ों की संपत्ति लेकर कुंभन दास जी की झोपड़ी पर पहुँचा।
उसी समय कुंभन दास जी तिलक कर रहे थे और ठाकुर जी उनकी गोद में बैठे बातें कर रहे थे।
जैसे ही राजा ने प्रवेश किया — ठाकुर जी अंतर्ध्यान हो गए।
😢 भक्त का विरह और राजा की असफलता
कुंभन दास जी ने चारों ओर देखा —
“अरे लाला, कहाँ चले गए? अभी तो कुछ कह रहे थे, मेरी ठोड़ी पकड़ के…”
उन्हें राजा दिख भी नहीं रहा था। वे केवल अपने ठाकुर जी को खोज रहे थे।
राजा ने कहा —
“मैं राजा हूँ। ठाकुर जी के आदेश से आपकी सेवा में संपत्ति लाया हूँ।”
कुंभन दास जी बोले —
“जैसे ही तू आया, मेरो लाला चला गया। सब लेके वापस जा।”
राजा ने आग्रह किया —
“कुछ तो स्वीकार कर लीजिए।”
कुंभन दास जी बोले —
“अगर कुछ देना ही है, तो दोबारा अपना मुँह मत दिखाना।”
राजा आश्चर्यचकित रह गया। करोड़ों की संपत्ति ठुकरा दी गई।
🌸 जब ठाकुर जी पुनः प्रकट हुए
राजा चला गया।
थोड़ी देर बाद ठाकुर जी फिर प्रकट हुए।
कुंभन दास जी की आँखों में आँसू थे —
“नाथ, कहाँ चले गए थे?”
ठाकुर जी बोले —
“कुंभना, मैंने ही तो राजा भेजा था। तू इतना अकिंचन है, झोपड़ी में रहता है। क्यों नहीं ली संपत्ति?”
कुंभन दास जी folded hands —
“जिस संपत्ति के द्वार पर आते ही आप चले गए, उसे घर में ले लेता तो क्या होता?
और नाथ, यदि मैंने स्वीकार किया होता, तो आप यह पूछने दोबारा आते क्या?
आप सोचते — अब सब मिल गया कुंभन को।
हमारे लिए सर्व धन, सर्व संपत्ति आप ही तो हैं।”
🔥 निष्कर्ष: सच्चा वैराग्य क्या है?
यह कथा हमें सिखाती है —
- भक्ति में बाहरी साधन नहीं, आंतरिक प्रेम आवश्यक है।
- जहाँ धन आता है, वहाँ अक्सर भगवान का स्मरण कम हो जाता है।
- सच्चा वैष्णव वही है, जो भगवान को ही अपनी संपत्ति माने।
कुंभन दास जी ने यह सिद्ध किया कि निष्किंचन भक्ति ही सर्वोच्च है।
📿 आध्यात्मिक संदेश
आज हम भगवान से क्या माँगते हैं?
धन, सफलता, पद, प्रतिष्ठा…
लेकिन कुंभन दास जी ने केवल एक ही माँग रखी —
“नाथ, आप मेरे पास बने रहो।”
और भगवान भी उसी प्रेम से बंध गए।
🙏 अंतिम विचार
यदि आपके जीवन में भी कभी ऐसा क्षण आए जहाँ धन और भगवान में से एक चुनना हो — तो इस कथा को स्मरण करना।
क्योंकि अंत में —
संपत्ति नहीं, संग चाहिए।
वैभव नहीं, विरह चाहिए।
राज्य नहीं, राधे-श्याम चाहिए।