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🌸 प्रस्तावना
जब भी हम भगवान को याद करते हैं, तो अक्सर उन्हें विराट, सर्वशक्तिमान, सृष्टि के रचयिता के रूप में देखते हैं।
परंतु भक्ति की भूमि में भगवान केवल ईश्वर नहीं होते — वे पुत्र होते हैं, मित्र होते हैं, प्रियतम होते हैं।
ऐसी ही एक करुण और दिव्य लीला घटी जब श्रीकृष्ण द्वारका से कुरुक्षेत्र आए और ब्रजवासियों को उनके आगमन का समाचार मिला।
🌿 समाचार जो गोकुल तक पहुँचा
जब यह खबर गोकुल पहुँची कि कृष्ण कुरुक्षेत्र आए हैं, तो पूरे ब्रज में हलचल मच गई।
हर हृदय में एक ही प्रश्न था —
“क्या हमारा कान्हा हमें पहचान पाएगा?”
ब्रजवासी चल पड़े — कुछ पैदल, कुछ बैलगाड़ियों में, कुछ वृद्ध सहारे से…
उनमें दो अत्यंत वृद्ध भी थे —
नंद बाबा… और यशोदा मैया…
👵 “कन्हैया कहाँ है?”
जब वे कुरुक्षेत्र पहुँचे, तो उन्होंने द्वारका के लोगों से पूछा —
“अरे कन्हैया कहाँ है? हमारा लल्ला कहाँ है?”
द्वारका के लोगों ने उत्तर दिया —
“कौन कन्हैया? यहाँ तो द्वारकाधीश श्रीकृष्ण चंद्र महाराज हैं।”
यह सुनकर वे थोड़े सहम गए।
उन्होंने धीरे से कहा —
“अच्छा… वही… द्वारकाधीश से मिलवा दो…
हम ब्रज से आए हैं…
मैं नंद हूँ… और यह यशोदा है…”
🚪 द्वारपाल का स्तब्ध हो जाना
जब द्वारपाल ने सुना कि ये नंद बाबा और यशोदा मैया हैं, तो वह उनके चरणों में गिर पड़ा।
वह दौड़ता हुआ महल में पहुँचा।
भगवान सभा में बैठे थे।
द्वारपाल ने साहस करके कहा —
“महाराज… गोकुल से नंद बाबा और यशोदा मैया आए हैं…”
⚡ वह क्षण जब भगवान स्थिर हो गए
जैसे ही यह शब्द कृष्ण के कानों में पहुँचे —
“नंद बाबा… यशोदा मैया…”
भगवान स्थिर हो गए।
यह शायद वह पहला क्षण था जब अनंत ब्रह्मांड का स्वामी अपनी भावनाओं में बंध गया।
सभा मौन हो गई।
समय ठहर गया।
🏃♂️ भगवान दौड़ पड़े
अचानक कृष्ण उठे…
राजसी मर्यादा भूलकर…
मुकुट, सिंहासन, राज्य… सब पीछे छोड़कर…
वे दौड़ पड़े।
सामने वृद्ध यशोदा मैया थीं —
कमजोर… झुकी हुई… कांपते कदम…
नंद बाबा की आँखें आँसुओं से भरी थीं।
😭 “मैया…”
कृष्ण उनके सामने खड़े थे।
शब्द नहीं निकल रहे थे।
काँपती आवाज में बोले —
“मैया…”
यशोदा मैया ने उत्तर दिया —
“द्वारकाधीश श्रीकृष्ण चंद्र महाराज…”
कृष्ण रो पड़े —
“ऐसा मत कहो मैया… मैं तेरा वही कान्हा हूँ… तेरा लल्ला…”
🤱 माँ का स्पर्श
यशोदा मैया ने कृष्ण को स्पर्श किया।
उनके गालों को छुआ।
कहा —
“अरे लल्ला… तू तो बिल्कुल भी बड़ा नहीं हुआ…
तेरा शरीर तो अब भी उतना ही कोमल है…”
वह फूट-फूटकर रोने लगीं।
नंद बाबा रो रहे थे।
कृष्ण रो रहे थे।
🌺 इस लीला का आध्यात्मिक रहस्य
यह मिलन केवल माता-पुत्र का नहीं था।
यह भक्ति और भगवान का मिलन था।
द्वारका में कृष्ण राजा थे।
पर ब्रज में वे केवल “कान्हा” थे।
भगवान को प्रेम बाँधता है — पद, शक्ति या वैभव नहीं।
🕊 ब्रज प्रेम क्यों सर्वोच्च है?
ब्रज का प्रेम निस्वार्थ है।
वह भगवान को ईश्वर नहीं मानता —
वह उन्हें अपना मानता है।
इसीलिए कहा गया है —
“भगवान को प्राप्त करने का मार्ग ज्ञान नहीं, प्रेम है।”
💖 भावार्थ
यह कथा हमें सिखाती है —
• भगवान को औपचारिकता नहीं चाहिए
• उन्हें हृदय का स्नेह चाहिए
• वे वैभव से नहीं, प्रेम से बंधते हैं
🙏 निष्कर्ष
कुरुक्षेत्र का यह मिलन हमें याद दिलाता है कि चाहे भगवान कितने भी विराट क्यों न हों,
उनके लिए “मैया” का संबोधन आज भी सबसे प्रिय है।
और शायद इसलिए —
कृष्ण आज भी ब्रज में कान्हा हैं।