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🌼 प्रस्तावना
भारत की भक्ति परंपरा में अनेक ऐसी कथाएं मिलती हैं जो यह सिद्ध करती हैं कि भगवान को आडंबर नहीं, बल्कि सच्चा प्रेम और भाव प्रिय होता है। ऐसी ही एक अमर कथा है भक्त कर्माबाई और जगन्नाथ जी की, जो हमें सिखाती है कि भगवान के लिए बाहरी नियमों से अधिक महत्वपूर्ण भक्त का प्रेम है।
🌸 कौन थीं कर्माबाई?
कर्माबाई एक सरल, निष्कपट और अत्यंत भावुक भक्त थीं। जब जगन्नाथ मंदिर में भगवान की सेवा प्रारंभ हुई थी, तब कर्माबाई छोटी थीं। बचपन से ही उनका एक नियम था — रोज प्रातः 4 बजे उठकर खिचड़ी बनाना और उसे मंदिर में भोग के लिए भेजना।
पंडित जी उस खिचड़ी को भगवान को अर्पित करते थे। यह क्रम वर्षों तक चलता रहा।
🍚 खिचड़ी का भोग – प्रेम का प्रसाद
कर्माबाई के लिए खिचड़ी कोई साधारण भोजन नहीं था। वह उनके प्रेम और भक्ति का प्रतीक था।
समय बीतता गया, कर्माबाई वृद्ध हो गईं। घुटनों ने जवाब दे दिया। अब मंदिर जाना संभव नहीं रहा।
एक दिन उन्होंने रोते हुए कहा —
“लाला, अब मैं मंदिर नहीं आ पाऊंगी। अगर मेरा प्रेम सच्चा है तो तुम ही मेरे घर आ जाना।”
🌅 भगवान का भक्त के घर आगमन
अगली सुबह कर्माबाई ने खिचड़ी बनाई। तभी दरवाजे पर आवाज आई —
“अम्मा, खिचड़ी!”
दरवाजा खोलकर देखा तो एक सुंदर बालक खड़ा था।
अम्मा समझ गईं — “लाला, तू आ गया!”
बालक अंदर आया, बैठा, खिचड़ी खाई और चला गया।
यह क्रम प्रतिदिन चलने लगा।
🕉 पंडित जी का संदेह
कुछ दिनों तक मंदिर में खिचड़ी का भोग नहीं लगा। पंडित जी चिंतित हुए।
वे कर्माबाई के घर पहुंचे। देखा कि अम्मा खिचड़ी बना रही हैं।
उन्होंने कहा —
“अम्मा, आप बिना स्नान किए खिचड़ी बना रही हैं? पहले शुद्ध होकर पूजा करें, फिर भोग बनाएं।”
अम्मा ने उनकी बात मान ली।
🔥 गरम खिचड़ी और भगवान का जलता मुख
अगले दिन अम्मा पहले स्नान-पूजन में लग गईं। देर हो गई।
तभी फिर आवाज आई — “अम्मा, जल्दी करो! मंदिर का फाटक खुलने वाला है!”
अम्मा ने जल्दी-जल्दी गरम खिचड़ी परोसी।
बालक ने जल्दबाजी में गरम-गरम खिचड़ी खाई और दौड़ गया। पानी भी नहीं पिया।
उधर मंदिर में जब फाटक खुले, तो पंडित जी ने देखा —
भगवान के श्रीविग्रह पर गरम खिचड़ी लगी हुई है।
उन्होंने हाथ से साफ करना चाहा — हाथ जल गया!
🌙 स्वप्न में भगवान का संदेश
उस रात पंडित जी को स्वप्न में जगन्नाथ जी दर्शन दिए।
भगवान बोले —
“पंडित! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी अम्मा को टोकने की?
मुझे उनका भाव प्रिय है, न कि तुम्हारे नियम।
आज मेरा मुख जल गया। तुम्हारा हाथ थोड़ा जला तो दर्द हुआ, सोचो मेरा कितना जला होगा।”
पंडित जी की आंखें खुलीं। वे रो पड़े।
🙏 क्षमा और सच्चे भाव की जीत
सुबह-सुबह पंडित जी भागते हुए कर्माबाई के पास पहुंचे।
उनके चरणों में गिरकर बोले —
“अम्मा, मुझे क्षमा कर दो। आपकी भक्ति के सामने हम सब छोटे हैं।”
कहते हैं कि आज भी जगन्नाथ जी भक्त के भाव से बंधे हैं।
और जगन्नाथ मंदिर में पहला भोग खिचड़ी का ही लगता है, जिसे कर्माबाई के नाम से जाना जाता है।
🌺 कथा से मिलने वाली सीख
- भगवान को आडंबर नहीं, सच्चा प्रेम प्रिय है।
- नियम तभी सार्थक हैं जब उनमें भाव हो।
- सच्ची भक्ति भगवान को भी भक्त के वश में कर देती है।
- ईश्वर भक्त के प्रेम के आगे स्वयं झुक जाते हैं।
✨ निष्कर्ष
कर्माबाई और जगन्नाथ जी की यह कथा हमें सिखाती है कि भक्ति का मूल तत्व “भाव” है।
अगर हृदय में सच्चा प्रेम हो, तो भगवान स्वयं दरवाजे पर आकर कहते हैं —
“अम्मा, खिचड़ी!”