
(आस्था, ध्यान और सच्ची भक्ति का अद्भुत चमत्कार)
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श्री स्वामी हरिदास की अद्भुत लीला: जब इत्र चढ़ा बिना चढ़ाए
भक्ति में शक्ति कितनी होती है, इसका अद्भुत उदाहरण है यह कथा। यह कथा है वृंदावन के महान संत श्री हरिदास जी की, जो केवल शरीर से नहीं, बल्कि चेतना से ठाकुर जी की सेवा करते थे।
सेठ का अहंकार और भक्ति की परीक्षा
एक धनी सेठ ने श्री हरिदास जी का बहुत नाम सुना था। उसने सोचा – “ऐसे महान संत के पास जाऊंगा और बांके बिहारी जी को अत्यंत महंगा इत्र चढ़ाऊंगा।”
वह दूर देश (कहते हैं पाकिस्तान से) से प्रसिद्ध इत्र लेकर आया। उसका उद्देश्य साफ था – वह इत्र सीधे ठाकुर जी को अर्पित होगा।
सेठ जाकर हरिदास जी के पास बैठ गया। उस समय हरिदास जी गहरे ध्यान में लीन थे।
ध्यान में चल रही थी दिव्य होली
हरिदास जी की आंखें बंद थीं, पर उनका मन नित्य वृंदावन में था। ध्यान में वे देख रहे थे कि श्री राधा रानी और श्री कृष्ण होली खेल रहे हैं।
श्रीकृष्ण के पास रंग ही रंग था, पर राधा रानी के पास रंग समाप्त हो गया।
यह दृश्य हरिदास जी के अंतरमन में पूर्ण रूप से सजीव था।
इत्र जमीन पर क्यों उड़ेला गया?
सेठ ने इत्र की बोतल हरिदास जी के चरणों में रख दी, सोचकर कि जब उनकी आंखें खुलेंगी तो वह निवेदन करेगा।
लेकिन अचानक, ध्यान अवस्था में ही हरिदास जी ने इत्र की बोतल उठाई और पूरा इत्र जमीन पर उंडेल दिया।
सेठ घबरा गया।
वह सोचने लगा – “इतनी दूर से लाया था, इतना महंगा इत्र था, और इन्होंने सब बर्बाद कर दिया!”
पर हरिदास जी तो उस समय ध्यान में ही राधा रानी को वह सुगंध अर्पित कर चुके थे।
सच्चाई का खुलासा
जब हरिदास जी के नेत्र खुले तो उन्होंने सेठ से पूछा:
“बिहारी जी के दर्शन किए?”
सेठ बोला, “नहीं महाराज, मैं तो सीधे आपके पास आ गया था, सोचा आप ही इत्र चढ़ा देंगे।”
हरिदास जी मुस्कुराए और बोले:
“पहले जाओ, बिहारी जी के दर्शन करके आओ।”
बांके बिहारी मंदिर में चमत्कार
सेठ जैसे ही श्री बांके बिहारी मंदिर पहुँचा, वह स्तब्ध रह गया।
पूरे मंदिर में उसी इत्र की अद्भुत सुगंध फैली हुई थी।
ठाकुर जी पर वही खुशबू चढ़ी हुई थी, जो उसने हरिदास जी को दी थी।
तब उसे समझ आया —
भक्ति में जो समर्पण होता है, वह भौतिक सीमाओं से परे होता है।
इस कथा से मिलने वाली सीख
1️⃣ सच्ची भक्ति में माध्यम की आवश्यकता नहीं
सच्चा भक्त सीधे भगवान तक पहुँच सकता है।
2️⃣ ध्यान की शक्ति असीम है
जब संत ध्यान में होते हैं, वे वास्तव में दिव्य लोक में सेवा कर रहे होते हैं।
3️⃣ अहंकार भक्ति में बाधा है
सेठ का उद्देश्य आंशिक रूप से दिखावा था। पर अंत में उसे सच्ची श्रद्धा का अनुभव हुआ।
4️⃣ वृंदावन की लीला आज भी जीवित है
वृंदावन में भक्ति केवल कहानी नहीं, अनुभव है।
आध्यात्मिक विश्लेषण
भक्ति मार्ग में संत केवल साधारण व्यक्ति नहीं होते। वे चेतना के उच्च स्तर पर स्थित होते हैं।
श्री हरिदास जी जैसे संतों के लिए भगवान कोई कल्पना नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव हैं।
यह कथा हमें सिखाती है कि:
- ईश्वर तक पहुँचने के लिए बाहरी वस्तुओं से अधिक जरूरी है आंतरिक श्रद्धा।
- सच्ची सेवा मन से होती है, न कि केवल हाथों से।
- भगवान भाव के भूखे हैं, वस्तु के नहीं।
निष्कर्ष
श्री हरिदास जी की यह लीला केवल एक चमत्कार नहीं, बल्कि भक्ति की गहराई का प्रमाण है।
जमीन पर गिरा इत्र व्यर्थ नहीं गया — वह सीधे बिहारी जी तक पहुँचा।
जब भक्ति सच्ची होती है, तो दूरी, समय और पदार्थ की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं।
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