जब भगवान श्रीकृष्ण ने दिखाई अपनी विराट शक्ति – महाभारत का अद्भुत प्रसंग


प्रस्तावना

महाभारत केवल एक युद्ध कथा नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष का शाश्वत इतिहास है। इस महाग्रंथ में एक ऐसा प्रसंग आता है जब स्वयं श्रीकृष्ण शांति का प्रस्ताव लेकर कौरवों के दरबार में पहुंचे।

उन्होंने केवल पांच गांव मांगे — ताकि पांडव और कौरव बिना युद्ध के शांतिपूर्वक रह सकें। लेकिन अहंकार, षड्यंत्र और अज्ञान ने इतिहास की दिशा बदल दी।


श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव: केवल पांच गांव

जब पांडवों का वनवास और अज्ञातवास समाप्त हुआ, तब धर्मराज युधिष्ठिर ने युद्ध टालने का प्रयास किया। श्रीकृष्ण स्वयं हस्तिनापुर पहुंचे और दुर्योधन से कहा:

“हमें सम्पूर्ण राज्य नहीं चाहिए। केवल पांच गांव दे दो – अवन्ति, वाराणावत, काशी, हस्तिनापुर के आसपास के पांच छोटे स्थान – ताकि पांडव शांतिपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकें।”

यह प्रस्ताव अत्यंत न्यायपूर्ण था। न कोई युद्ध, न रक्तपात।

लेकिन दुर्योधन ने अहंकार में उत्तर दिया:

“सूई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं दूंगा!”


शकुनी की चाल और दुर्योधन का अहंकार

शकुनी ने दुर्योधन को उकसाया कि कृष्ण को बंदी बना लो।
दुर्योधन ने दरबार में घोषणा कर दी कि श्रीकृष्ण को कैद कर लिया जाए।

परंतु प्रश्न था — जिसे समस्त ब्रह्मांड नहीं बांध सकता, उसे कौन बंदी बना सकता है?


श्रीकृष्ण का विराट रूप

जब दुर्योधन ने उन्हें बंदी बनाने का आदेश दिया, तब श्रीकृष्ण ने पहली बार अपने जीवनकाल में दरबार के बीच अपनी दिव्य ऊर्जा प्रकट की।

उन्होंने अपना विराट स्वरूप दिखाया।
दरबार प्रकाश से भर गया।
देवता, ब्रह्मांड, सूर्य-चंद्र, सभी उनके स्वरूप में समाहित दिखाई दिए।

यह संदेश स्पष्ट था —

“मैं समय हूं। मैं धर्म हूं। मुझे कोई बांध नहीं सकता।”

इसके बाद श्रीकृष्ण ने कहा — अब युद्ध निश्चित है।


धृतराष्ट्र और राज ज्योतिषी का भ्रम

धृतराष्ट्र चिंतित थे। उन्होंने राज ज्योतिषी को बुलाया।

राज ज्योतिषी ने कहा:

“महाराज, दुर्योधन की कुंडली में राजयोग है। वह अवश्य विजयी होगा।”

इसी भविष्यवाणी के आधार पर युद्ध की घोषणा हुई।


युद्ध के आठ दिन बाद का सत्य

युद्ध प्रारंभ हुआ।
तीन दिन बाद कौरव कमजोर पड़ने लगे।
आठ दिन बाद आधी सेना समाप्त हो चुकी थी।

धृतराष्ट्र ने पुनः राज ज्योतिषी को बुलाया और पूछा — “यह क्या हो रहा है?”

ज्योतिषी ने उत्तर दिया:

“वहां कोई है जिसने नक्षत्रों की दिशा बदल दी है। कोई है जो समय और भाग्य से परे है।”

तभी महात्मा विदुर ने कहा —

“वह कृष्ण हैं।”


जब कृष्ण साथ हों तो नक्षत्र भी चरणों में होते हैं

जहां श्रीकृष्ण होते हैं, वहां ग्रह-नक्षत्र, भाग्य और समय भी उनके अधीन हो जाते हैं।
दुर्योधन की कुंडली में राजयोग हो सकता था, लेकिन धर्म के विरुद्ध खड़े व्यक्ति की विजय संभव नहीं।

यह प्रसंग सिखाता है —

  • केवल ज्योतिष नहीं, धर्म भी आवश्यक है।
  • केवल शक्ति नहीं, नीति भी जरूरी है।
  • जहां भगवान का साथ होता है, वहां ब्रह्मांड भी साथ देता है।

आध्यात्मिक विश्लेषण

यह कथा केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि जीवन दर्शन है।

  1. अहंकार विनाश का कारण बनता है।
  2. ईश्वर को बांधने का प्रयास स्वयं को बांधने जैसा है।
  3. भाग्य से ऊपर भी एक शक्ति है — दिव्य चेतना।

निष्कर्ष

महाभारत का यह प्रसंग हमें बताता है कि जब भगवान स्वयं शांति का प्रस्ताव लेकर आए और उसे ठुकरा दिया गया, तब विनाश अवश्यंभावी था।

दुर्योधन की हार केवल युद्ध की हार नहीं थी, बल्कि अधर्म की हार थी।

और यह सत्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है —

“जिसके साथ कृष्ण होते हैं, उसके साथ सम्पूर्ण ब्रह्मांड होता है।”

श्रीकृष्ण को बंदी बनाने की भूल – कैसे बदले नक्षत्र और तय हो गया महाभारत का युद्ध

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