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अजब कुमारी की अनन्य भक्ति और चौसर लीला का दिव्य रहस्य
जब भी कोई पूछता है — “श्रीनाथ जी मेवाड़ क्यों गए?” — तो यह केवल एक ऐतिहासिक प्रश्न नहीं है। यह प्रेम, भक्ति, विरह और भगवान की भक्त-वात्सल्य लीला का प्रश्न है।
श्रीनाथ जी मूल रूप से ब्रज में, गोवर्धन पर्वत (गिरिराज जी) पर विराजमान थे। वे वही स्वरूप हैं जिन्होंने इंद्र के अभिमान को तोड़ने के लिए गोवर्धन उठाया था। ब्रजवासियों के हृदय में वे बसते थे।
तो फिर ऐसा क्या हुआ कि ब्रज के श्रीनाथ जी मेवाड़ चले गए?
इस प्रश्न का उत्तर हमें एक अद्भुत कथा में मिलता है — अजब कुमारी की कथा।
1. मेवाड़ की राजकुमारी और ब्रज की भूमि
मेवाड़ की एक राजकुमारी थीं — अजब कुमारी।
राजघराने में जन्मी, वैभव में पली-बढ़ी, पर हृदय में अत्यंत कोमल और भक्ति से ओत-प्रोत। एक दिन वे अपने पिता के साथ ब्रज यात्रा पर निकलीं — वृंदावन, बरसाना और गिरिराज जी के दर्शन हेतु।
ब्रज की भूमि पर कदम रखते ही उनके भीतर कुछ बदलने लगा। यह केवल पर्यटन नहीं था। यह आत्मा का अपने स्वामी से मिलन था।
जब वे गिरिराज जी पहुँचीं और श्रीनाथ जी के दर्शन किए — उसी क्षण उनका जीवन बदल गया।
2. प्रथम दर्शन – और चेतना का परिवर्तन
कहते हैं, भगवान के दर्शन केवल आँखों से नहीं होते — हृदय से होते हैं।
अजब कुमारी ने जब श्रीनाथ जी के विग्रह को देखा, तो वे स्तब्ध रह गईं। वह केवल पत्थर की मूर्ति नहीं थी — वह जीवंत अनुभूति थी।
उनकी आँखें हटती नहीं थीं। शरीर वहीं था, पर आत्मा मानो श्रीनाथ जी में विलीन हो गई थी।
दर्शन के बाद जब वापसी का समय आया — उनका मन वहीं रह गया।
3. विरह की अग्नि – राजमहल में बीमारी
मेवाड़ लौटते समय जैसे-जैसे रथ आगे बढ़ता, उनका हृदय पीछे छूटता जाता।
उन्हें लगने लगा — “मेरा सब कुछ ब्रज में रह गया।”
मेवाड़ पहुँचते ही वे बीमार पड़ गईं।
राजवैद्य बुलाए गए। हकीम बुलाए गए। औषधियाँ दी गईं। पर रोग बढ़ता गया।
यह शरीर का रोग नहीं था।
यह विरह का रोग था।
4. रोग का कारण – ठाकुर जी से दूर होना
अंततः जब उनसे पूछा गया — “राजकुमारी, आपको क्या चाहिए?”
उन्होंने कहा —
“मुझे ब्रज जाना है। मुझे ठाकुर जी के पास जाना है।”
बस! रोग का कारण स्पष्ट हो गया।
यह विरह था। यह प्रेम था। यह भक्ति का ज्वर था।
5. पुनः ब्रज आगमन – सेवा की याचना
अजब कुमारी पुनः ब्रज पहुँचीं। गिरिराज जी के चरणों में उपस्थित हुईं।
उन्होंने गोस्वामियों से विनती की —
“आप सब ठाकुर जी की सेवा करते हैं। मुझे भी कोई सेवा दे दीजिए। मैं भी यहीं रहना चाहती हूँ।”
गोस्वामी ने कहा —
“तुम्हें जो आता है, वही करो। वही तुम्हारी सेवा होगी।”
6. चौसर लीला – भक्त और भगवान का खेल
अजब कुमारी बोलीं —
“मुझे चौसर खेलना आता है। मैं ठाकुर जी के साथ चौसर खेलूँगी।”
और यहीं से प्रारंभ हुई अद्भुत लीला।
प्रतिदिन चौसर बिछती।
एक ओर राजकुमारी।
दूसरी ओर श्रीनाथ जी।
वे दोनों की बारी स्वयं चलातीं।
पर अंत में — प्रतिदिन — ठाकुर जी को जिता देतीं।
7. विग्रह की मुस्कान – साक्षात अनुभव
धीरे-धीरे कुछ अद्भुत होने लगा।
जब अजब कुमारी ठाकुर जी को जिता देतीं — तो श्रीनाथ जी के विग्रह पर मुस्कान प्रकट होती।
पहले यह केवल उन्हें दिखता था।
फिर अन्य भक्तों को भी दिखाई देने लगा।
कई बार जब श्रीनाथ जी हारने को होते — तो उनके विग्रह पर पसीने की बूंदें तक देखी गईं।
यह केवल मूर्ति नहीं थी।
यह जीवंत लीला थी।
8. अंतिम दिन – निर्णय की घड़ी
एक दिन संदेश आया —
“राजकुमारी, अब आपको मेवाड़ लौटना होगा।”
उस दिन अजब कुमारी के हृदय में द्वंद्व था।
उन्होंने सोचा —
“आज मैं ठाकुर जी को नहीं जिताऊँगी। आज मैं स्वयं जीतूँगी।”
चौसर बिछी।
चालें चली गईं।
इस बार ठाकुर जी निरंतर हार रहे थे।
विग्रह पर उदासी झलक रही थी।
अजब कुमारी यह सहन न कर सकीं।
अंतिम क्षण में — उन्होंने फिर ठाकुर जी को जिता दिया।
9. अंतिम विनती – और दिव्य वरदान
आँखों में आँसू।
हृदय कांप रहा था।
वे उठकर जाने लगीं।
तभी —
श्रीनाथ जी ने उनकी बाह पकड़ ली।
“मैं तेरी भक्ति से प्रसन्न हूँ। मांग — क्या चाहती है?”
अजब कुमारी बोलीं —
“जो मांगूँगी, दोगे?”
श्रीनाथ जी बोले —
“तेरे मांगने में देर हो सकती है। मेरे देने में नहीं। कह क्या चाहिए?”
राजकुमारी ने कहा —
“यदि सच में कुछ देना चाहते हो — तो सदा के लिए मेवाड़ आ जाओ। ताकि मैं प्रतिदिन आपके दर्शन कर सकूँ।”
10. भक्त-वात्सल्य का चरम
भगवान बंधन में नहीं आते।
पर प्रेम से बंध जाते हैं।
अजब कुमारी ने न धन माँगा, न राज्य, न वैभव।
उन्होंने केवल दर्शन माँगे।
और यही भक्ति का शिखर है।
11. श्रीनाथ जी का मेवाड़ आगमन
कथा के अनुसार, श्रीनाथ जी ने अपने भक्त की प्रार्थना स्वीकार की।
समय के साथ, ऐतिहासिक परिस्थितियों में भी ब्रज से श्रीनाथ जी का विग्रह मेवाड़ लाया गया।
आज वे नाथद्वारा में विराजमान हैं।
12. आध्यात्मिक अर्थ – यह कथा हमें क्या सिखाती है?
1. सच्ची भक्ति स्वार्थरहित होती है
2. विरह भी कृपा का रूप है
3. भगवान को प्रेम से जीता जा सकता है
4. सेवा वही जो हृदय से हो
5. भगवान भक्त के प्रेम से बंध जाते हैं
13. चौसर लीला का गूढ़ संदेश
चौसर केवल खेल नहीं था।
यह जीवन का प्रतीक था।
हम चाल चलते हैं।
भगवान भी चाल चलते हैं।
पर अंत में जीत उसी की होती है —
जो भगवान को जिता दे।
14. श्रीनाथ जी मेवाड़ क्यों गए? – निष्कर्ष
तो अब उत्तर स्पष्ट है —
श्रीनाथ जी मेवाड़ इसलिए गए क्योंकि एक भक्त ने उन्हें प्रेम से बुलाया।
न तलवार से।
न शक्ति से।
न राजनीति से।
बल्कि आँसुओं से।
अंतिम भाव
भक्ति में तर्क नहीं चलता।
भक्ति में केवल प्रेम चलता है।
अजब कुमारी ने भगवान को जीतकर भी हराया नहीं —
हराकर भी जिताया।
और अंत में —
भगवान स्वयं उनके साथ चल पड़े।