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मेवाड़ की पावन धरा पर विराजमान श्रीनाथ जी की महिमा सदियों से भक्तों के हृदय में श्रद्धा और आस्था का प्रकाश जगाती रही है। इतिहास और लोककथाओं में एक प्रसंग विशेष रूप से प्रसिद्ध है—जब मुगल बादशाह औरंगज़ेब श्रीनाथ जी के दर्शन हेतु मेवाड़ पहुँचा और दिव्य प्रकाश को सहन न कर सका।
यह कथा केवल इतिहास नहीं, बल्कि आस्था, चमत्कार और क्षमा की शक्ति का अद्भुत संगम है।
श्रीनाथ जी का मेवाड़ आगमन
मुगल काल में मंदिरों पर संकट के बादल मंडरा रहे थे। कहा जाता है कि जब विग्रह को सुरक्षित स्थान पर ले जाने की आवश्यकता हुई, तब श्रीनाथ जी की मूर्ति को मेवाड़ लाया गया।
आज जिस स्थान को हम नाथद्वारा के नाम से जानते हैं, वहीं श्रीनाथ जी की हवेली मंदिर स्थापित है।
यह स्थान केवल मंदिर नहीं, बल्कि करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र है।
औरंगज़ेब का क्रोध और मेवाड़ आगमन
जब औरंगज़ेब को ज्ञात हुआ कि विग्रह सुरक्षित रूप से मेवाड़ पहुँच चुका है, तो वह क्रोधित हुआ। कहा जाता है कि उसने स्वयं मेवाड़ जाकर स्थिति देखने का निश्चय किया।
लोककथाओं के अनुसार, जब वह मंदिर प्रांगण में प्रवेश किया, तो वहां दिव्य प्रकाश इतना प्रबल था कि उसकी आँखें उसे सहन नहीं कर सकीं।
बताया जाता है कि वह कुछ समय के लिए अंधा हो गया।
माँ की प्रार्थना और हीरे की भेंट
जब यह समाचार औरंगज़ेब की माँ तक पहुँचा, तो वह अत्यंत व्यथित हुईं।
कहते हैं कि वे श्रीनाथ जी से क्षमा मांगने पहुँचीं। उन्होंने उपहार स्वरूप एक अनमोल हीरा अर्पित किया—जो आज भी श्रीनाथ जी की ठोड़ी में जड़ा हुआ माना जाता है।
भक्तों का विश्वास है कि उसी प्रार्थना के पश्चात औरंगज़ेब की दृष्टि लौट आई।
दाढ़ी से झाड़ू लगाने की कथा
एक और प्रसिद्ध लोककथा के अनुसार, औरंगज़ेब ने पश्चाताप स्वरूप अपनी दाढ़ी से मंदिर प्रांगण में झाड़ू लगाई।
कहा जाता है कि वह केवल एक ही स्थान पर झुका—वह स्थान जहाँ श्रीनाथ जी विराजमान थे।
यह प्रसंग बताता है कि ईश्वर के समक्ष सम्राट भी साधारण हो जाता है।
क्या यह इतिहास है या आस्था?
इतिहासकारों के अनुसार, इस कथा का लिखित प्रमाण सीमित है, परंतु लोकपरंपरा और भक्तों की आस्था में यह कथा जीवित है।
धार्मिक स्थलों की महिमा अक्सर जनश्रुतियों से पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती है।
श्रीनाथ जी मंदिर की विशेषता
- प्रतिदिन अलग-अलग श्रृंगार
- अन्नकूट और जन्माष्टमी का भव्य उत्सव
- पुष्टिमार्ग की परंपरा
- देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु
नाथद्वारा आज राजस्थान का प्रमुख तीर्थ स्थल है।
निष्कर्ष
यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर की महिमा के आगे सत्ता और शक्ति भी नतमस्तक हो जाती है।
श्रीनाथ जी केवल एक विग्रह नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के प्रेम का प्रतीक हैं।
चाहे इसे इतिहास मानें या आस्था—यह प्रसंग श्रद्धा, क्षमा और दिव्य शक्ति की अद्भुत कहानी है।