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🔱 प्रस्तावना
भारत की संत परंपरा में अनेक ऐसी घटनाएं सुनने को मिलती हैं, जो हमें गुरु-शिष्य संबंध की गहराई और संतों की दिव्य शक्ति का अनुभव कराती हैं। ऐसी ही एक अद्भुत और चेतावनी देने वाली कथा है स्वामी परमानंद जी की।
यह कथा केवल एक चमत्कार नहीं, बल्कि विश्वास, श्रद्धा और विश्वासघात का जीवंत उदाहरण है।
🧘♂️ कौन थे स्वामी परमानंद जी?
स्वामी परमानंद जी एक सिद्ध महापुरुष थे। वे अत्यंत तेजस्वी, शांत और आत्मज्ञानी संत माने जाते थे। उनका आश्रम एक प्रसिद्ध स्थान पर था, जहां दूर-दूर से लोग उनके दर्शन और आशीर्वाद के लिए आते थे।
उनकी सेवा में कई शिष्य रहते थे, जो बाहरी रूप से तो श्रद्धावान दिखते थे, लेकिन हर हृदय में सच्ची भक्ति नहीं होती।
😔 शिष्य का लालच और विश्वासघात
उनके पास एक शिक्षित, बुद्धिमान और अत्यंत चतुर शिष्य आया। वह पहले एक मास्टर (अध्यापक) था। उसने स्वामी जी की संपत्ति और प्रतिष्ठा देखकर शिष्यत्व ग्रहण किया।
धीरे-धीरे उसने अपनी चतुराई से अन्य शिष्यों को दूर कर दिया और स्वयं स्वामी जी के अत्यंत निकट पहुंच गया। उसका उद्देश्य सेवा नहीं, बल्कि अधिकार और नियंत्रण था।
☠️ विष का षड्यंत्र
स्वामी जी की दिनचर्या में एक विशेष बात थी — वे 24 घंटे में एक बार भांग ग्रहण करते थे। संतों की अपनी-अपनी साधना की विधियां होती हैं।
एक दिन उस शिष्य ने भांग में विष मिला दिया।
वह सोच रहा था कि अब गुरु का अंत निश्चित है।
जब स्वामी जी ने पात्र उठाया, तो वे मुस्कुराए। वे सिद्ध संत थे। उन्होंने सभी को बाहर भेज दिया और उस शिष्य को बुलाकर कहा:
“बच्चा, देख तेरे जहर का कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं।”
उन्होंने “हरि ओम” का उच्चारण किया और पूरा मिश्रण पी गए।
🧘 सात दिन की समाधि
विष पीने के बाद स्वामी जी सात दिनों तक पद्मासन में बैठे रहे।
प्रतिदिन वे उसी शिष्य को बुलाकर कहते:
“देख, तेरे जहर का कोई असर हुआ?”
जहर का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
क्योंकि सिद्ध संत अपने शरीर और प्राणों पर पूर्ण नियंत्रण रखते हैं।
🔥 मृत्यु भी इच्छा से
सातवें दिन स्वामी जी ने कहा:
“अब मैं अपना शरीर अपनी इच्छा से त्यागता हूं, तेरे जहर से नहीं।”
जैसे ही उन्होंने संकल्प किया, विष ने पूरे शरीर में प्रभाव दिखाया और उन्होंने शांत भाव से देह त्याग दी।
यह सिद्ध करता है कि संत मृत्यु को भी अपनी इच्छा से स्वीकार करते हैं।
⚖️ विश्वासघाती शिष्य का दंड
इसके बाद उस शिष्य की स्थिति भयावह हो गई।
कहा जाता है कि उसके शरीर में दरारें पड़ने लगीं, घावों से मवाद निकलने लगा। वह चिल्ला-चिल्लाकर कहता:
“मैंने गुरु को जहर दिया, मेरी दुर्दशा हो रही है। कोई मुझे बचा लो!”
उसकी रातों की नींद गायब हो गई।
भोजन का स्वाद चला गया।
मन अशांत हो गया।
गुरु-द्रोह का परिणाम भयानक होता है।
📿 इस कथा से मिलने वाली सीख
- गुरु केवल शरीर नहीं, चेतना होते हैं।
- सिद्ध संतों पर भौतिक शक्तियों का प्रभाव नहीं होता।
- लालच अंततः विनाश का कारण बनता है।
- गुरु के प्रति विश्वासघात आत्मा को भी बेचैन कर देता है।
🌺 निष्कर्ष
स्वामी परमानंद जी की यह कथा हमें यह सिखाती है कि संतों की शक्ति केवल बाहरी नहीं, आंतरिक और दिव्य होती है। जो व्यक्ति गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा रखता है, वह उन्नति करता है। और जो विश्वासघात करता है, उसका पतन निश्चित है।
गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊंचा माना गया है।
इसलिए कहा गया है:
“गुरु बिन ज्ञान नहीं, और गुरु द्रोह से कल्याण नहीं।”
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