ताज बेगम, ब्रज मंडल, होली लीला, श्याम सुंदर, श्रीनाथ जी, पुष्टिमार्ग परंपरा, विट्ठलनाथ जी, वृंदावन होली, धमार पद

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ब्रज की पावन भूमि पर अनेक भक्तों ने अपनी भक्ति से इतिहास रचा है। उन्हीं में से एक थीं ताज बेगम—एक ऐसी विरक्त भक्त, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन ब्रज मंडल में श्री ठाकुर जी की भक्ति में अर्पित कर दिया। उनकी होली लीला का प्रसंग आज भी पुष्टिमार्गीय परंपरा में गाया जाता है और हृदय को भक्ति से सराबोर कर देता है।
ताज बेगम का ब्रजवास
कहा जाता है कि ताज बेगम कभी मंदिरों में नहीं गईं। उन्होंने ब्रज मंडल में यमुना तट पर एक छोटी सी कुटिया बनाकर निवास किया। उनका जीवन अत्यंत सरल और पूर्णतः भक्ति में लीन था।
होली के दिन चल रहे थे—वही उल्लास, वही रंग, वही उमंग। प्रतिदिन ताज बेगम अपनी कुटिया से निकलतीं और ब्रजवासियों को रंग खेलते देखतीं। गोप-गोपियों को अबीर-गुलाल उड़ाते देख उनके मन में एक ही प्रश्न उठता—
“श्याम सुंदर कब रंग डालेंगे?”
दिव्य होली का दर्शन
मुख्य होली का पर्व आने वाला था। चार तारीख की प्रातः बेला में ताज बेगम ने नेत्र बंद कर ध्यान लगाया। तभी उन्हें संपूर्ण ब्रज मंडल में द्वापर युग की होली का साक्षात् दर्शन हुआ।
उन्हें क्या दिखा?
- इधर से गोपियों के समूह चले आ रहे हैं।
- उनके मध्य में यशोदा मैया।
- उधर से ग्वालों का समूह, जिनके बीच नंद बाबा।
- सखियों की टोलियों के बीच श्री राधा रानी।
- गायें, ग्वाले, गोपियां, नंद रानी, वृषभानु बाबा, कीर्ति मैया—संपूर्ण ब्रज उत्सव में मग्न।
चारों ओर रंग, पिचकारी, गुलाल, नृत्य और हर्ष का अद्भुत दृश्य था।
लेकिन… ठाकुर जी दिखाई नहीं दिए।
अंतिम पद और अधूरी पंक्ति
ताज बेगम जो देखती जातीं, उसे पद के रूप में लिखती जातीं। वे पुष्टिमार्ग की परंपरा से जुड़ी थीं और विट्ठलनाथ जी की शिष्या मानी जाती हैं। उनके पद आज भी धमार शैली में गाए जाते हैं, विशेषकर श्रीनाथ जी मंदिर में, जब कपाट खुलते हैं और ठाकुर जी के गाल पर गुलाल सजता है।
वह लिखती जा रही थीं—
गोपियां दिखीं, ग्वाले दिखे, राधा रानी दिखीं…
पर ठाकुर जी नहीं दिखे।
श्याम सुंदर के चरणों का दर्शन
अचानक उन्होंने एक अद्भुत सखा-समूह आते देखा। उनका हृदय व्याकुल हो उठा। संपूर्ण जीवन ब्रज में व्यतीत कर दिया, परंतु ठाकुर जी का अनुभव अभी तक नहीं हुआ था।
तभी—
- पीताम्बर धारण किए,
- श्याम वर्ण,
- चरणों का दर्शन,
- घुटनों का दर्शन,
- कटी प्रदेश में फेंटा बंधा,
- गुलाल से भरी पिचकारी।
धीरे-धीरे दृष्टि ऊपर उठी—
उदर, वक्ष, ग्रीवा…
जैसे ही ठोड़ी तक पहुंचीं—
प्राण निकल गए।
मुख-दर्शन से पहले ही वे ठाकुर जी में लीन हो गईं।
अधूरी पंक्ति पूरी करने आए श्याम
परंपरा है कि पद रचने वाला अंतिम पंक्ति में अपना नाम अवश्य लिखता है। ताज बेगम भी अपने प्रत्येक पद में “ताज” लिखती थीं।
इस अंतिम पद की आखिरी पंक्ति अधूरी रह गई।
कहा जाता है कि उसी क्षण आकाश में काली घटा छा गई, स्वर लहरियां गूंज उठीं, और स्वयं श्याम सुंदर प्रकट हुए।
उन्होंने अपने करकमलों से अंतिम पंक्ति लिखी—
“नतत आवत ताज के प्रभु गावत गीत धमा”
और ताज बेगम को अपने साथ निकुंज में ले गए।
आज भी जीवित है यह परंपरा
यह पद आज भी ब्रज में, विशेषकर होली के अवसर पर, गाया जाता है। जब श्रीनाथ जी के कपाट खुलते हैं और उनके गालों पर गुलाल सजा होता है, तब यह धमार गूंजती है।
ताज बेगम की यह कथा केवल एक भक्ति प्रसंग नहीं, बल्कि यह बताती है कि सच्ची भक्ति में दर्शन की अभिलाषा ही जीवन का सार बन जाती है।
निष्कर्ष
ताज बेगम का जीवन हमें यह सिखाता है—
- भक्ति में बाहरी आडंबर आवश्यक नहीं।
- सच्चा प्रेम अंततः भगवान को प्रकट होने पर विवश कर देता है।
- ब्रज की होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, आत्मा और परमात्मा के मिलन का पर्व है।
ब्रज की होली आज भी वही है—रंग वही हैं, बस देखने वाली आंखें चाहिए।