तुलसीदास जी और हनुमान चालीसा का अद्भुत रहस्य: क्यों “जय सियाराम” से प्रसन्न होते हैं हनुमान जी?


प्रस्तावना

भक्ति के मार्ग में एक अद्भुत कथा प्रचलित है कि जब गोस्वामी तुलसीदास जी हनुमान चालीसा लिखना चाहते थे, तब स्वयं हनुमान उन्हें लिखने नहीं दे रहे थे। कारण क्या था? क्या हनुमान जी अपनी प्रशंसा से असहज होते हैं? और क्यों “जय सियाराम” कहने मात्र से वे तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं?

यह कथा केवल एक कहानी नहीं, बल्कि भक्ति का गहरा रहस्य है।


तुलसीदास जी की इच्छा और हनुमान जी की विनम्रता

कथा के अनुसार, तुलसीदास जी कई दिनों से हनुमान चालीसा लिखना चाहते थे। जैसे ही वे लिखने बैठते—

“श्री गुरु चरण सरोज रज निज मन मुकुर सुधारी,
बरनऊँ रघुवर विमल जसु…”

तभी हनुमान जी प्रकट होकर कहते—
“बाबा, यह क्या लिख रहे हो? मेरी प्रशंसा क्यों?”

हनुमान जी को एक ही बात से “समस्या” थी—स्वयं की स्तुति

वे चाहते थे कि उनका गुणगान न हो, बल्कि उनके आराध्य श्रीराम का यश गाया जाए।


“बरनऊँ रघुवर विमल जसु” – यही है कुंजी

जब तुलसीदास जी ने लिखा—

“बरनऊँ रघुवर विमल जसु…”

अर्थात, मैं श्रीराम के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ—

तो हनुमान जी अत्यंत प्रसन्न हुए।

क्योंकि हनुमान जी को सबसे प्रिय क्या है?

“राम प्रभु चरित सुनिबे को रसिया”

उन्हें केवल राम कथा सुनना और सुनाना ही प्रिय है।


क्यों “जय सियाराम” अधिक प्रभावी है?

अक्सर लोग कहते हैं—
“जय हनुमान”
“जय बजरंगबली”

निश्चित ही यह भी मंगलकारी है।

परंतु जब कोई भक्त प्रेम से कहता है—

“जय सियाराम”

तो हनुमान जी तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं।

क्यों?

क्योंकि हनुमान जी के लिए उनका अस्तित्व ही श्रीराम की सेवा है।
वे स्वयं को नहीं, केवल राम-सीता को देखते हैं।

उनका हृदय सदा यही कहता है—

“राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।”


हनुमान चालीसा की रचना का आध्यात्मिक संदेश

हनुमान चालीसा में जब हम पढ़ते हैं—

“जय हनुमान ज्ञान गुण सागर”

तो हनुमान जी उसमें लीन हो जाते हैं।

लेकिन जब अंत में हम कहते हैं—

“राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप”

तो यह केवल हनुमान जी को नहीं, बल्कि स्वयं श्रीराम को आमंत्रण है।

और हनुमान जी के लिए इससे बड़ा सुख क्या हो सकता है कि कोई उनके सामने राम कथा गाए?


भक्ति का सर्वोच्च सूत्र

इस कथा से हमें तीन मुख्य शिक्षा मिलती हैं:

1️⃣ सच्चा भक्त स्वयं की प्रशंसा नहीं चाहता

हनुमान जी की विनम्रता अद्वितीय है।

2️⃣ भगवान से भी बढ़कर भक्त का प्रेम

हनुमान जी का हृदय केवल राम नाम में रमा है।

3️⃣ राम नाम ही सर्वोच्च मंत्र

“जय सियाराम” में सीता और राम दोनों का स्मरण है—पूर्ण भक्ति का प्रतीक।


तुलसीदास और हनुमान जी का दिव्य संबंध

गोस्वामी तुलसीदास को स्वयं हनुमान जी का आशीर्वाद प्राप्त था।
मान्यता है कि तुलसीदास जी को श्रीराम के दर्शन भी हनुमान जी की कृपा से हुए।

इसीलिए हनुमान चालीसा केवल एक स्तोत्र नहीं—
यह भक्त और भगवान के बीच प्रेम का सेतु है।


निष्कर्ष

हनुमान जी को प्रसन्न करने का सबसे सरल उपाय क्या है?

✔ राम नाम का जप
✔ राम कथा का श्रवण
✔ “जय सियाराम” का उच्चारण

क्योंकि संसार में यदि कोई वस्तु हनुमान जी को सबसे अधिक प्रिय है, तो वह है—
राम का यश।

अंत में बस इतना याद रखिए—

जो राम का है, वही हनुमान का है।
और जो राम कथा गाता है, वह हनुमान जी को सबसे अधिक प्रिय है।


FAQ (SEO के लिए)

Q1. क्या हनुमान जी अपनी प्रशंसा पसंद नहीं करते?
कथा के अनुसार, वे अत्यंत विनम्र हैं और स्वयं की स्तुति से अधिक राम नाम को प्रिय मानते हैं।

Q2. हनुमान जी को प्रसन्न करने का सबसे सरल मंत्र क्या है?
“जय सियाराम” का प्रेमपूर्वक जप।

Q3. हनुमान चालीसा किसने लिखी?
गोस्वामी तुलसीदास ने।

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