वज्रनाभ द्वारा स्थापित राधा-कृष्ण के तीन दिव्य विग्रह: मदनमोहन, गोपीनाथ और गोविंददेव की अद्भुत कथा

प्रस्तावना: लीला पूर्ण होने के बाद की खोज

जब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी धरती की लीलाएं पूर्ण कीं और द्वारका से अपने धाम प्रस्थान किया, तब केवल उनके उपदेश, उनकी गीता, उनकी कथाएं और उनके भक्तों की स्मृतियां शेष रहीं।

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। यदुवंश का भी अंत हो चुका था।

लेकिन एक प्रश्न था —
भगवान वास्तव में दिखते कैसे थे?

यह प्रश्न केवल सामान्य जन के मन में नहीं था, बल्कि स्वयं उनके वंशज के हृदय में भी था।


यदुवंश की वंशावली और वज्रनाभ का जन्म

भगवान श्रीकृष्ण की प्रमुख रानी रुक्मिणी से उत्पन्न पुत्र थे प्रद्युम्न।
प्रद्युम्न के पुत्र थे अनिरुद्ध।
और अनिरुद्ध के पुत्र थे — वज्रनाभ।

अर्थात वज्रनाभ भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र (Great Grandson) थे।

यदुवंश की परंपरा में जन्मे वज्रनाभ बचपन से केवल एक ही बात सुनते आए थे—

  • कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया
  • कृष्ण ने अर्जुन का सारथ्य किया
  • कृष्ण ने रास रचाई
  • कृष्ण ने गोवर्धन उठाया

लेकिन उन्होंने स्वयं कभी कृष्ण को देखा नहीं।


वज्रनाभ की तीव्र इच्छा

वज्रनाभ के मन में तीव्र आकांक्षा उत्पन्न हुई—

“मैं जानना चाहता हूं कि मेरे प्रभु, मेरे पूर्वज, मेरे आराध्य वास्तव में कैसे दिखते थे।”

लेकिन समस्या यह थी कि कृष्ण की समकालीन अधिकांश पीढ़ी धाम गमन कर चुकी थी।

तभी उन्हें स्मरण हुआ एक व्यक्तित्व का—
जो कृष्ण काल में भी थीं और उनके समय में भी जीवित थीं।


उत्तरा — अंतिम साक्षी

वह थीं — उत्तरा।
अभिमन्यु की पत्नी और परीक्षित की माता।

उत्तरा ने स्वयं कृष्ण को देखा था।
उन्होंने युद्धभूमि में उनका विराट स्वरूप देखा था।
उन्होंने उन्हें अपने गर्भस्थ शिशु परीक्षित की रक्षा करते हुए देखा था।

वज्रनाभ उनके पास गए और विनम्र प्रार्थना की—

“माते, कृपया मुझे बताइए कि प्रभु वास्तव में कैसे दिखते थे। मैं उनकी मूर्ति बनवाना चाहता हूं।”

उत्तरा सहमत हुईं।


देवशिल्पी विश्वकर्मा का आह्वान

मूर्ति निर्माण कोई साधारण कार्य नहीं था।
वज्रनाभ ने देवताओं के दिव्य वास्तुकार — विश्वकर्मा — का आह्वान किया।

विश्वकर्मा प्रकट हुए और मूर्ति निर्माण प्रारंभ हुआ।

उत्तरा वर्णन करती जातीं, और विश्वकर्मा शिल्प करते जाते।


प्रथम प्रयास — चरण कमल की पूर्णता

पहली मूर्ति तैयार हुई।

वज्रनाभ ने पूछा —
“माते, क्या प्रभु ऐसे ही दिखते थे?”

उत्तरा ने ध्यान से देखा और कहा—

“भगवान के चरण कमल बिल्कुल ऐसे ही थे।
ये चरण पूर्णतया मिलते हैं।
लेकिन ऊपर का भाग उतना सटीक नहीं है।”

इस प्रकार प्रथम विग्रह की विशेषता बनी —
चरणों की परिपूर्णता।

यह विग्रह कहलाया —

राधा मदन मोहन मंदिर

आध्यात्मिक रहस्य:
मदनमोहन का अर्थ है — जो कामदेव को भी मोहित कर ले।

भक्ति सिद्धांत में यह विग्रह साधना की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।
भक्त पहले प्रभु के चरणों में शरण लेते हैं।


दूसरा प्रयास — वक्षस्थल की दिव्यता

दूसरी मूर्ति का निर्माण हुआ।

उत्तरा ने देखा और कहा—

“भगवान का वक्षस्थल, उनका वक्ष, उनका मध्यभाग — बिल्कुल सटीक है।
परंतु मुखमंडल पूरी तरह नहीं आया।”

इस प्रकार दूसरा विग्रह बना —

राधा गोपीनाथ मंदिर

गोपीनाथ — गोपियों के स्वामी।

यह विग्रह भक्ति के मध्यम स्तर का प्रतीक है —
जहां भक्त प्रभु के हृदय से जुड़ता है।


तीसरा प्रयास — मुखारविंद की पूर्णता

तीसरी बार मूर्ति बनाई गई।

उत्तरा ने देखा और उनकी आंखों में आंसू आ गए—

“यह वही मुख है।
यही वह मुस्कान है।
यही वह नेत्र हैं।
प्रभु का मुखमंडल बिल्कुल ऐसा ही था।”

लेकिन चरण और वक्ष पूर्णतया मेल नहीं खा रहे थे।

यह विग्रह कहलाया —

गोविंद देव जी मंदिर

वृंदावन का मूल मंदिर था —

गोविंद देव मंदिर

गोविंददेव भक्ति के परम स्तर का प्रतीक हैं —
जहां भक्त प्रभु के मुखारविंद के दर्शन में लीन हो जाता है।


औरंगजेब का आक्रमण और विग्रहों का स्थानांतरण

मुगल काल में जब औरंगज़ेब ने मंदिरों पर आक्रमण किया, तब वृंदावन के कई मंदिर तोड़े गए।

किंवदंती है कि गोविंददेव मंदिर से दिव्य प्रकाश निकला।
विग्रहों को सुरक्षित रखने हेतु उन्हें जयपुर ले जाया गया।

आज जयपुर में गोविंद देव जी का भव्य मंदिर स्थापित है।


तीन विग्रहों का आध्यात्मिक रहस्य

विग्रहविशेषताआध्यात्मिक अर्थ
मदनमोहनचरणशरणागति
गोपीनाथवक्षस्थलहृदय संबंध
गोविंददेवमुखारविंदप्रेम का चरम

भक्ति मार्ग में यह तीन चरण माने जाते हैं—

  1. चरणों में समर्पण
  2. हृदय से जुड़ाव
  3. मुखारविंद में प्रेमपूर्ण लीनता

वृंदावन की आध्यात्मिक पहचान

वृंदावन केवल एक नगर नहीं —
यह रासभूमि है।
यह प्रेम का केंद्र है।

इन तीन विग्रहों ने वृंदावन को पुनः आध्यात्मिक केंद्र बनाया।


वज्रनाभ की विरासत

वज्रनाभ ने केवल मूर्तियां नहीं बनवाईं।
उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को भगवान का साक्षात स्वरूप प्रदान किया।

यदि वे यह प्रयास न करते, तो आज हम कृष्ण के दिव्य स्वरूप की कल्पना भी नहीं कर पाते।


दार्शनिक विश्लेषण

यह कथा केवल ऐतिहासिक घटना नहीं है।

यह संकेत देती है—

  • भगवान को पूर्णतः कोई नहीं जान सकता।
  • कोई उनके चरण समझता है।
  • कोई उनके हृदय को।
  • कोई उनके मुख की मुस्कान को।

पूर्णता केवल ईश्वर में है।


निष्कर्ष

वज्रनाभ की यह खोज केवल एक वंशज की जिज्ञासा नहीं थी।
यह समस्त मानवता को कृष्ण का दिव्य स्वरूप देने का प्रयास था।

आज भी जब भक्त वृंदावन या जयपुर में दर्शन करते हैं,
तो वे केवल पत्थर की मूर्ति नहीं देखते —
वे उस स्मृति को देखते हैं
जो उत्तरा के वर्णन से जन्मी
और विश्वकर्मा के शिल्प से आकार पाई।

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