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🌸 प्रस्तावना: जहां धन नहीं, नाम है असली दक्षिणा
धरा पर कई संत हुए, जिन्होंने संसार को त्याग, भक्ति और सेवा का मार्ग दिखाया। लेकिन आज के कलियुग में भी यदि कोई संत धन से अधिक “नाम” को महत्व दे — तो यह अपने आप में एक चमत्कार है।
उत्तर प्रदेश के पावन धाम वृंदावन में एक ऐसे ही महात्मा विराजमान हैं, जिनकी दक्षिणा लेने की विधि सुनकर हर कोई चकित रह जाता है।
वे कहते हैं —
“मेरी भिक्षा रुपयों में नहीं, राधा नाम में है।”
🌺 कथा प्रारंभ: 101 रुपये और 101 बार ‘राधा’
एक दिन एक श्रद्धालु महात्मा जी के पास पहुंचा। उसने श्रद्धा से एक लिफाफा उनके चरणों में रख दिया।
महात्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा —
“लिफाफा खोलो।”
वह बोला —
“महाराज जी, यह तो हमारी श्रद्धा सुमन है।”
महात्मा जी बोले —
“श्रद्धा सुमन स्वीकार है, पर खोल तो सही। कितने रुपये हैं?”
लिफाफा खोला गया — उसमें 101 रुपये थे।
महात्मा जी बोले —
“अच्छा, तो अब 101 बार ‘राधा राधा’ बोलो। गिनती हम करवाते हैं।”
वह व्यक्ति बैठ गया।
“राधा… राधा… राधा…”
101 बार नाम पूर्ण हुआ।
जैसे ही 101 बार ‘राधा’ नाम पूरा हुआ, महात्मा जी ने वह 101 रुपये वापस उसकी गोद में रख दिए।
और बोले —
“अब इसे किसी गौशाला में दे देना, या किसी असहाय की सहायता कर देना। मेरी भिक्षा तो तूने दे दी — तूने राधा नाम ले लिया, बस वही पर्याप्त है।”
💎 बड़ा दान, बड़ा नाम — 11000 राधा नाम
कुछ समय बाद एक धनवान व्यक्ति आया। वह 11,000 रुपये लेकर आया था।
उसने श्रद्धा से लिफाफा चढ़ाया।
महात्मा जी बोले —
“खोलो।”
वह भी पहले झिझका —
“महाराज जी, यह तो श्रद्धा सुमन है।”
महात्मा जी मुस्कुराए —
“श्रद्धा है तो खुलने में डर कैसा? खोलो।”
लिफाफा खुला —
11000 रुपये।
महात्मा जी के चेले ने हंसते हुए कहा —
“बेटा, आज तो तू फंस गया!”
महात्मा जी बोले —
“शुरू हो जा। 11000 रुपये लाया है, तो 11000 बार ‘राधा’ नाम जपना होगा। जितनी बड़ी दक्षिणा, उतना बड़ा नाम।”
वह व्यक्ति बैठ गया।
घंटों बीत गए…
“राधा… राधा… राधा…”
जब 11000 बार नाम पूर्ण हुआ, तब महात्मा जी ने वे 11000 रुपये वापस उसके हाथ में रख दिए।
और बोले —
- किसी गरीब कन्या का विवाह करा देना
- किसी गौशाला में गौसेवा हेतु दे देना
- किसी वैष्णव संतों का भंडारा करा देना
“मेरी भिक्षा तो नाम में है। तुमने नाम दे दिया — और क्या चाहिए?”
🌼 इस कथा का आध्यात्मिक संदेश
1️⃣ नाम ही सबसे बड़ा धन है
संतों के लिए असली संपत्ति धन नहीं, बल्कि ईश्वर का नाम है।
2️⃣ दान का उद्देश्य सेवा हो
दक्षिणा संत को समृद्ध करने के लिए नहीं, बल्कि समाज की सेवा के लिए होनी चाहिए।
3️⃣ जप से मन शुद्ध होता है
101 या 11000 बार “राधा” नाम जपते-जपते मन शांत हो जाता है, अहंकार गल जाता है।
4️⃣ संत का असली स्वरूप
सच्चा संत वही है जो लेने नहीं, देने की प्रेरणा दे।
🌷 ‘राधा नाम’ की महिमा
भक्ति मार्ग में “राधा” नाम को अत्यंत मधुर और प्रभावशाली माना गया है।
जब कोई “राधा” कहता है, तो वह सीधे प्रेम, करुणा और समर्पण की ऊर्जा से जुड़ता है।
कहा भी गया है —
“राधा नाम बिना श्याम अधूरा।”
🐄 गौसेवा और कन्यादान का महत्व
महात्मा जी ने जो मार्ग बताया, वह सनातन संस्कृति की जड़ से जुड़ा है —
- गौसेवा — धर्म और करुणा का प्रतीक
- कन्यादान — पुण्य और सामाजिक उत्तरदायित्व
- संत भंडारा — सेवा और सद्भाव का विस्तार
इस प्रकार धन का सदुपयोग भी हुआ और नाम जप का पुण्य भी।
🔥 आज के समय में यह संदेश क्यों जरूरी है?
आज लोग दान तो करते हैं, लेकिन कई बार उसमें दिखावा, अहंकार या प्रसिद्धि की चाह होती है।
यह कथा सिखाती है —
पहले नाम कमाओ, फिर नाम से दान करो।
🌟 निष्कर्ष: असली दक्षिणा क्या है?
वृंदावन के इस महात्मा ने संसार को सरल शब्दों में समझा दिया —
- धन क्षणिक है
- नाम शाश्वत है
- दान समाज के लिए हो
- भिक्षा संत को नहीं, ईश्वर को दो
जब तक 11000 राधा नाम पूर्ण नहीं हुए, व्यक्ति उठ नहीं पाया।
पर जब उठकर गया — तो वह पहले जैसा व्यक्ति नहीं था।
उसके भीतर अब नाम का खजाना था।
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