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भारत की आध्यात्मिक धरती पर आंध्र प्रदेश की सात पहाड़ियों के बीच स्थित तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र है।
भक्त भगवान वेंकटेश्वर को प्रेम से बालाजी, श्रीनिवास, गोविंदा और वेंकटाचलपति जैसे नामों से पुकारते हैं। मान्यता है कि कलियुग में भगवान विष्णु स्वयं वेंकटेश्वर के रूप में तिरुमला की पवित्र पहाड़ियों पर विराजमान हुए।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान विष्णु को पृथ्वी पर आने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
भगवान श्रीनिवास ने वैकुंठ क्यों छोड़ा?
मां लक्ष्मी उनसे क्यों नाराज हुईं?
भगवान वेंकटेश्वर का पद्मावती से विवाह कैसे हुआ?
और आखिर भगवान ने पाषाण स्वरूप धारण करके तिरुमला में हमेशा के लिए निवास क्यों किया?
इन सभी प्रश्नों के पीछे एक अद्भुत पौराणिक कथा जुड़ी हुई है।
आइए जानते हैं भगवान वेंकटेश्वर के तिरुमला आने की पूरी कथा, जो भृगु ऋषि से शुरू होकर भगवान श्रीनिवास, मां लक्ष्मी और देवी पद्मावती तक पहुंचती है।
तिरुमला की सात पहाड़ियों का क्या महत्व है?
तिरुमला की सात पहाड़ियों को अत्यंत पवित्र माना जाता है।
मान्यता के अनुसार ये सात पहाड़ियां भगवान विष्णु के वाहन और शेषनाग के सात फनों का प्रतीक हैं।
इनके नाम हैं—
- शेषाद्री
- नीलाद्री
- गरुड़ाद्री
- अंजनाद्री
- वृषभाद्री
- नारायणाद्री
- वेंकटाद्री
इन्हीं में सातवीं पहाड़ी वेंकटाद्री पर भगवान वेंकटेश्वर का मुख्य मंदिर स्थित है।
इसे आनंद निलय यानी आनंद का निवास भी कहा जाता है।
लेकिन इस पवित्र स्थान पर भगवान के प्रकट होने की कथा एक महान यज्ञ से शुरू होती है।
भगवान विष्णु की परीक्षा लेने पहुंचे भृगु ऋषि
एक समय महर्षि कश्यप की अध्यक्षता में अनेक ऋषि-मुनि सरस्वती नदी के तट पर एक विशाल यज्ञ कर रहे थे।
यह यज्ञ संसार के कल्याण के लिए किया जा रहा था।
यज्ञ के दौरान ऋषियों के मन में एक प्रश्न उठा—
ब्रह्मा, विष्णु और महेश में सबसे श्रेष्ठ कौन हैं?
त्रिदेवों में कौन ऐसा है जो तीनों गुणों से परे है?
और इस यज्ञ का फल किस देवता को अर्पित किया जाना चाहिए?
इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए ऋषियों ने महर्षि भृगु को चुना।
भृगु ऋषि महान विद्वान और ब्रह्मज्ञानी माने जाते थे, लेकिन उनके स्वभाव में क्रोध भी बताया गया है।
कथा के अनुसार उनके पैर के तलवे में एक अतिरिक्त नेत्र था, जिसे उनके ज्ञान और अहंकार का प्रतीक माना गया।
भृगु ऋषि तीनों लोकों में जाकर त्रिदेवों की परीक्षा लेने के लिए निकल पड़े।
सबसे पहले पहुंचे ब्रह्मलोक
भृगु ऋषि सबसे पहले सत्यलोक पहुंचे।
वहां उन्होंने भगवान ब्रह्मा को देखा।
ब्रह्मा जी वेदों की चर्चा में लीन थे।
भृगु ऋषि के वहां पहुंचने पर ब्रह्मा जी ने उनका स्वागत नहीं किया।
ना प्रणाम किया और ना ही कोई विशेष स्तुति की।
भृगु ऋषि को यह बात अच्छी नहीं लगी।
उनके मन में क्रोध उत्पन्न हुआ।
उन्होंने समझा कि यहां अभी भी रजोगुण का प्रभाव मौजूद है।
इसके बाद वे कैलाश की ओर चल पड़े।
कैलाश पर भगवान शिव की परीक्षा
भृगु ऋषि कैलाश पहुंचे।
उस समय भगवान शिव देवी पार्वती के साथ एकांत में थे।
भृगु ऋषि के अचानक पहुंचने से वहां व्यवधान उत्पन्न हुआ।
भगवान शिव को क्रोध आने लगा।
उनका तीसरा नेत्र खुलने की स्थिति बन गई।
स्थिति गंभीर हो सकती थी।
लेकिन देवी पार्वती ने भगवान शिव को शांत किया और एक बड़ा संकट टल गया।
भृगु ऋषि ने यहां भी एक अलग प्रकार की प्रतिक्रिया देखी और आगे बढ़ गए।
अब वे वैकुंठ पहुंचे।
वैकुंठ में भगवान विष्णु योग निद्रा में थे
भृगु ऋषि जब वैकुंठ पहुंचे, तो वहां का वातावरण बिल्कुल अलग था।
हर तरफ शांति थी।
भगवान विष्णु शेषनाग की शैया पर योग निद्रा में विराजमान थे।
मां लक्ष्मी प्रेमपूर्वक उनके चरण दबा रही थीं।
भृगु ऋषि वहां पहुंचे, लेकिन भगवान विष्णु ने तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
भृगु ऋषि पहले ही ब्रह्मा और शिव से मिले अनुभवों के कारण क्रोधित थे।
उनका क्रोध और बढ़ गया।
अहंकार में आकर उन्होंने भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर लात मार दी।
यह वही वक्षस्थल था जिसे मां लक्ष्मी अपना निवास मानती हैं।
लेकिन भगवान विष्णु ने क्रोध नहीं किया।
इसके बजाय वे तुरंत उठे और भृगु ऋषि के चरणों में प्रणाम किया।
उन्होंने कहा—
“हे महर्षि! मेरा वक्षस्थल कठोर है और आपके चरण बहुत कोमल हैं। कहीं आपके पैर में चोट तो नहीं लगी?”
भगवान विष्णु ने भृगु ऋषि के पैर को अपने हाथों से सहलाया।
कथा के अनुसार इसी क्षण उन्होंने भृगु ऋषि के पैर में स्थित अहंकार के प्रतीक नेत्र को शांत कर दिया।
भृगु ऋषि का अहंकार समाप्त हो गया।
वे भगवान विष्णु के सामने नतमस्तक हो गए।
उन्होंने स्वीकार किया कि त्रिदेवों में भगवान विष्णु ही सबसे शांत और सात्विक हैं।
लेकिन इसी घटना से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की एक नई लीला शुरू होने वाली थी।
मां लक्ष्मी ने वैकुंठ क्यों छोड़ा?
भृगु ऋषि द्वारा भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर लात मारे जाने से मां लक्ष्मी अत्यंत आहत हुईं।
वह स्थान मां लक्ष्मी का निवास माना जाता है।
उन्हें लगा कि जहां उनके सम्मान की रक्षा नहीं हुई, वहां उनका रहना उचित नहीं है।
मां लक्ष्मी ने वैकुंठ छोड़ने का निर्णय लिया।
वह पृथ्वी पर करवीरपुर, जिसे आज कोल्हापुर से जोड़ा जाता है, पहुंचीं और वहां तपस्या करने लगीं।
मां लक्ष्मी के चले जाने से वैकुंठ भी जैसे सूना हो गया।
भगवान विष्णु अपनी प्रिय देवी के वियोग में व्याकुल हो उठे।
आखिरकार उन्होंने भी वैकुंठ छोड़ दिया।
भगवान विष्णु ने श्रीनिवास के रूप में लिया अवतार
मां लक्ष्मी की खोज में भगवान विष्णु पृथ्वी पर आए।
उन्होंने मानव रूप धारण किया और श्रीनिवास के नाम से तिरुमला की पहाड़ियों में पहुंचे।
वहां उन्होंने एक चींटी की बांबी यानी वल्मीक को अपना आश्रय बनाया।
श्रीनिवास उसी स्थान पर तपस्या करने लगे।
लेकिन मानव शरीर धारण करने के कारण उन्हें भोजन और जल की आवश्यकता महसूस होने लगी।
यह देखकर ब्रह्मा और शिव का हृदय द्रवित हो गया।
ब्रह्मा बने गाय और शिव बने बछड़ा
भगवान ब्रह्मा ने एक सुंदर गाय का रूप धारण किया।
भगवान शिव उसके बछड़े के रूप में प्रकट हुए।
सूर्यदेव ने एक साधारण ग्वाले का रूप धारण किया।
गाय और बछड़े को लेकर वे चोल देश के राजा के पास पहुंचे।
राजा ने उस सुंदर गाय को देखा और उसे खरीद लिया।
इसके बाद गाय दूसरी गायों के साथ प्रतिदिन वेंकटाचल के जंगलों में जाने लगी।
लेकिन जंगल पहुंचते ही वह चुपचाप श्रीनिवास की बांबी के पास चली जाती।
वह अपने थनों से दूध की धारा बहाती और वह दूध सीधे बांबी में चला जाता।
इसी दूध से भगवान श्रीनिवास की भूख शांत होती।
ग्वाले ने गाय पर क्यों किया हमला?
शाम को जब गाय वापस महल लौटती, तो उसके थनों में दूध नहीं होता था।
यह देखकर रानी को संदेह हुआ।
उन्होंने ग्वाले को इसका कारण पता लगाने का आदेश दिया।
अगले दिन ग्वाला गाय के पीछे-पीछे जंगल में पहुंचा।
उसने देखा कि गाय एक बांबी के ऊपर खड़ी होकर अपना पूरा दूध बहा रही है।
ग्वाले को लगा कि गाय दूध बर्बाद कर रही है।
क्रोध में उसने अपनी कुल्हाड़ी उठाई और गाय पर वार करने लगा।
लेकिन उसी क्षण भगवान श्रीनिवास बांबी से बाहर निकल आए।
उन्होंने गाय को बचाने के लिए कुल्हाड़ी का वार स्वयं सह लिया।
कुल्हाड़ी भगवान के सिर पर लगी।
उनके सिर से रक्त बहने लगा।
यह देखकर ग्वाला भयभीत होकर वहीं गिर पड़ा और उसकी मृत्यु हो गई।
गाय तुरंत राजा के पास पहुंची।
राजा गाय के पीछे-पीछे जंगल पहुंचे।
वहां उन्होंने श्रीनिवास को घायल अवस्था में देखा।
भगवान श्रीनिवास ने राजा को क्यों दिया श्राप?
भगवान श्रीनिवास ने राजा से कहा कि अपराध उसके सेवक ने किया है, लेकिन राजा होने के कारण सेवक के कर्मों की जिम्मेदारी भी राजा पर आती है।
राजा का कर्तव्य है कि वह अपने सेवकों को धर्म का पालन करना सिखाए।
इसी कारण श्रीनिवास ने राजा को श्राप दिया कि वह पिशाच बन जाएगा।
राजा घबरा गया।
वह भगवान के चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगा।
राजा का पश्चाताप देखकर भगवान का हृदय पिघल गया।
उन्होंने श्राप से मुक्ति का उपाय भी बताया।
भगवान ने कहा कि भविष्य में जब वे आकाश राजा की पुत्री से विवाह करेंगे, तब राजा उन्हें एक स्वर्ण मुकुट भेंट करेगा।
जब श्रीनिवास उस मुकुट को धारण करेंगे, तब राजा श्राप से मुक्त हो जाएगा।
वराह स्वामी ने श्रीनिवास को दी भूमि
घायल श्रीनिवास जंगल में औषधि की खोज कर रहे थे।
तभी उनकी भेंट वराह स्वामी से हुई।
मान्यता है कि भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध करने के बाद इन पहाड़ियों पर निवास किया था।
इसी कारण तिरुमला क्षेत्र को आदिवराह क्षेत्र भी कहा जाता है।
श्रीनिवास ने वराह स्वामी से रहने के लिए थोड़ी भूमि मांगी।
वराह स्वामी ने एक शर्त रखी—
जो भक्त तिरुमला आएगा, वह सबसे पहले वराह स्वामी के दर्शन करेगा।
श्रीनिवास ने यह शर्त स्वीकार कर ली।
इसी मान्यता के कारण तिरुमला यात्रा में आदिवराह स्वामी के दर्शन का विशेष महत्व बताया जाता है।
वकुला देवी कौन थीं?
इसके बाद वराह स्वामी ने श्रीनिवास को एक आश्रम में भेजा।
वहां एक वृद्ध तपस्विनी रहती थीं।
उनका नाम था वकुला देवी।
पौराणिक कथा के अनुसार वकुला देवी को द्वापर युग की यशोदा मैया का पुनर्जन्म माना जाता है।
द्वापर युग में यशोदा मैया ने भगवान कृष्ण का पालन-पोषण किया था।
लेकिन उन्हें कृष्ण का विवाह देखने का अवसर नहीं मिला था।
कथा के अनुसार भगवान कृष्ण ने उन्हें वचन दिया था कि अगले युग में उनकी यह इच्छा पूरी होगी।
जब वकुला देवी ने घायल श्रीनिवास को देखा तो उनके भीतर मां का वात्सल्य जाग उठा।
उन्होंने श्रीनिवास की सेवा की।
श्रीनिवास ने उन्हें अम्मा कहकर पुकारा।
वकुला देवी ने भी उन्हें अपने पुत्र के रूप में स्वीकार कर लिया।
देवी पद्मावती का जन्म कैसे हुआ?
अब कथा में प्रवेश होता है देवी पद्मावती का।
पद्मावती को देवी लक्ष्मी का अवतार माना जाता है।
उस समय तोंडमंडलम क्षेत्र पर राजा आकाश का शासन था।
राजा धर्मप्रिय थे लेकिन उन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं था।
कुलगुरु की सलाह पर उन्होंने पुत्रकामेष्टि यज्ञ करने का निर्णय लिया।
यज्ञ की भूमि को पवित्र करने के लिए राजा स्वयं सोने के हल से भूमि जोत रहे थे।
तभी हल की नोक किसी कठोर वस्तु से टकराई।
राजा ने वहां देखा कि एक विशाल स्वर्ण कमल खिला हुआ है।
उस कमल के बीच एक दिव्य कन्या विराजमान थी।
आकाशवाणी हुई कि राजा इस कन्या को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार करें।
कमल से जन्म लेने के कारण उसका नाम रखा गया—
पद्मावती।
श्रीनिवास और पद्मावती की पहली मुलाकात
समय के साथ राजकुमारी पद्मावती बड़ी हुईं।
एक दिन श्रीनिवास वन में गए।
वहां उन्होंने एक जंगली हाथी का पीछा किया।
हाथी नारायण वन के पास स्थित एक सुंदर उद्यान में पहुंच गया।
वहां राजकुमारी पद्मावती अपनी सखियों के साथ थीं।
हाथी को देखकर सभी भयभीत हो गईं।
श्रीनिवास ने आगे बढ़कर हाथी को नियंत्रित किया।
इसी दौरान श्रीनिवास और पद्मावती की पहली बार दृष्टि मिली।
कथा के अनुसार यह भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी का पुनर्मिलन था।
दोनों के मन में प्रेम जाग उठा।
वकुला देवी लेकर गईं विवाह का प्रस्ताव
आश्रम लौटने के बाद श्रीनिवास पद्मावती के विचारों में डूबे रहने लगे।
वकुला देवी ने जब उनकी यह अवस्था देखी तो कारण पूछा।
श्रीनिवास ने उन्हें पद्मावती के बारे में बताया।
उन्होंने मां से विवाह का प्रस्ताव लेकर राजा आकाश के पास जाने का अनुरोध किया।
वकुला देवी अपने पुत्र के लिए विवाह का प्रस्ताव लेकर राजमहल पहुंचीं।
कथा के अनुसार इससे पहले श्रीनिवास स्वयं भविष्यवक्ता के वेश में रानी धरणी देवी के पास पहुंचे थे।
उन्होंने बताया कि पद्मावती का विवाह एक ऐसे युवक से होगा जो वास्तव में भगवान विष्णु हैं।
जब वकुला देवी विवाह का प्रस्ताव लेकर पहुंचीं तो राजा और रानी इस दैवी संकेत को समझ चुके थे।
ज्योतिषीय संकेतों और गुरु बृहस्पति की सहमति के बाद राजा आकाश ने विवाह के लिए अपनी स्वीकृति दे दी।
लेकिन अब सामने एक बड़ी समस्या थी।
भगवान श्रीनिवास ने कुबेर से धन क्यों लिया?
श्रीनिवास ने वैकुंठ का ऐश्वर्य त्याग दिया था।
वे पृथ्वी पर एक साधारण वनवासी के रूप में रह रहे थे।
दूसरी ओर पद्मावती एक राजकुमारी थीं।
राजा चाहते थे कि विवाह अत्यंत भव्य तरीके से हो।
लेकिन श्रीनिवास के पास विवाह के लिए आवश्यक धन नहीं था।
तब भगवान ने देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर का स्मरण किया।
कुबेर ने विवाह के लिए धन देना स्वीकार किया।
कथा के अनुसार यह धन ऋण के रूप में लिया गया और भगवान श्रीनिवास ने वचन दिया कि कलियुग के अंत तक इस ऋण का ब्याज चुकाया जाएगा।
इसी कथा को तिरुमला मंदिर की हुंडी में भक्तों द्वारा दिए जाने वाले दान से जोड़ा जाता है।
भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवान वेंकटेश्वर को धन, सोना और आभूषण अर्पित करते हैं।
भगवान श्रीनिवास और पद्मावती का दिव्य विवाह
कुबेर से प्राप्त धन से विवाह की भव्य तैयारियां हुईं।
नारायण वन में भगवान श्रीनिवास और पद्मावती का विवाह संपन्न हुआ।
कथा के अनुसार इस दिव्य विवाह में देवता, ऋषि-मुनि, गंधर्व और किन्नर भी उपस्थित हुए।
विवाह के बाद चोल राजा और आकाश राजा ने श्रीनिवास को एक बहुमूल्य स्वर्ण मुकुट भेंट किया।
जब श्रीनिवास ने वह मुकुट धारण किया, तब चोल राजा अपने श्राप से मुक्त हो गया।
लेकिन भगवान की लीला अभी समाप्त नहीं हुई थी।
मां लक्ष्मी को कैसे पता चला कि श्रीनिवास ने विवाह कर लिया?
विवाह के कुछ समय बाद महर्षि नारद कोल्हापुर पहुंचे।
वहां मां लक्ष्मी तपस्या कर रही थीं।
कथा के अनुसार नारद जी ने उन्हें बताया कि भगवान विष्णु ने पद्मावती से विवाह कर लिया है।
यह सुनकर मां लक्ष्मी तिरुमला पहुंचीं।
वहां उनका सामना श्रीनिवास और पद्मावती से हुआ।
मां लक्ष्मी ने प्रश्न किया—
“मैं आपकी नित्य संगिनी हूं। मेरे रहते आपने दूसरा विवाह कैसे किया?”
पद्मावती ने भी अपने अवतार और पूर्व जन्म से जुड़े वचन की बात कही।
दोनों देवियों के बीच संवाद बढ़ने लगा।
भगवान श्रीनिवास इस स्थिति को देखकर अत्यंत व्याकुल हो गए।
भगवान वेंकटेश्वर ने पाषाण रूप क्यों धारण किया?
भगवान जानते थे कि कलियुग में मनुष्य अनेक प्रकार के दुखों से घिरा रहेगा।
उसे एक ऐसे भगवान की आवश्यकता होगी जो हमेशा उसके लिए उपलब्ध रहें।
इसीलिए भगवान श्रीनिवास ने पाषाण यानी शिला का स्वरूप धारण कर लिया।
भगवान को इस रूप में देखकर मां लक्ष्मी और पद्मावती दोनों का क्रोध शांत हो गया।
उन्हें समझ आ गया कि यह भगवान की दिव्य लीला है।
भगवान अब तिरुमला में सदैव के लिए स्थापित हो गए।
भगवान वेंकटेश्वर के वक्षस्थल पर कौन विराजमान हैं?
मान्यता के अनुसार भगवान वेंकटेश्वर के वक्षस्थल पर दोनों देवियों का निवास है।
देवी लक्ष्मी भगवान के वक्षस्थल के बाईं ओर विराजमान हैं।
उन्हें श्रीदेवी कहा जाता है।
देवी पद्मावती दाईं ओर भूदेवी के स्वरूप में विराजमान मानी जाती हैं।
आज भी भगवान वेंकटेश्वर के स्वरूप से जुड़ी पूजा परंपरा में इन दोनों देवियों का विशेष महत्व है।
तिरुमला बालाजी को “गोविंदा” क्यों कहा जाता है?
भगवान वेंकटेश्वर को भक्त प्रेम से गोविंदा भी पुकारते हैं।
तिरुमला की पहाड़ियों पर जब भक्त दर्शन के लिए आगे बढ़ते हैं, तो चारों ओर एक ही जयघोष सुनाई देता है—
“गोविंदा! गोविंदा!”
यह नाम भक्त और भगवान के बीच प्रेम और विश्वास का प्रतीक बन गया है।
भक्त मानते हैं कि भगवान वेंकटेश्वर कलियुग में उनकी पुकार सुनते हैं और उनके दुखों में सहारा देते हैं।
भगवान वेंकटेश्वर की कथा हमें क्या सिखाती है?
तिरुमला बालाजी की कथा केवल एक पौराणिक कहानी नहीं है।
इसके भीतर जीवन के कई गहरे संदेश छिपे हुए हैं।
1. अहंकार का अंत होना निश्चित है
भृगु ऋषि महान ज्ञानी थे, लेकिन उनके भीतर अहंकार आ गया था।
भगवान विष्णु ने क्रोध से नहीं बल्कि करुणा से उनके अहंकार को समाप्त किया।
2. पश्चाताप का महत्व
चोल राजा को जब अपने सेवक के कर्म का परिणाम समझ आया, तो उसने भगवान से क्षमा मांगी।
उसकी विनम्रता देखकर भगवान ने उसे मुक्ति का मार्ग दिया।
3. मां का प्रेम सबसे बड़ा होता है
वकुला देवी ने श्रीनिवास को अपने पुत्र के रूप में स्वीकार किया।
उनका वात्सल्य यह दिखाता है कि मां का प्रेम परिस्थिति नहीं देखता।
4. भगवान भक्त के लिए अपना ऐश्वर्य छोड़ सकते हैं
भगवान विष्णु वैकुंठ छोड़कर पृथ्वी पर आए।
उन्होंने राजसी जीवन के बजाय साधारण जीवन स्वीकार किया।
5. भगवान हमेशा किसी न किसी रूप में अपने भक्तों के पास रहते हैं
श्रीनिवास का पाषाण रूप धारण करना इसी विश्वास को मजबूत करता है कि भगवान पृथ्वी पर भक्तों के लिए सदैव उपस्थित रहेंगे।
क्यों खास है तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर?
तिरुमला केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए विश्वास का स्थान है।
लंबी यात्रा, कठिन चढ़ाई, दर्शन की प्रतीक्षा और हजारों भक्तों की भीड़ के बावजूद लोग भगवान के दर्शन के लिए आते हैं।
किसी के पास बड़ी समस्या होती है।
कोई मन की शांति चाहता है।
कोई अपने परिवार के लिए प्रार्थना करता है।
कोई अपनी मनोकामना लेकर आता है।
और कोई केवल भगवान के चरणों में अपना सिर झुकाने आता है।
जब मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन होते हैं, तो भक्तों के मुंह से अक्सर एक ही शब्द निकलता है—
गोविंदा! गोविंदा!
शायद यही तिरुमला की सबसे बड़ी शक्ति है।
निष्कर्ष
भगवान वेंकटेश्वर की कथा भृगु ऋषि की परीक्षा से शुरू होती है और भगवान श्रीनिवास के तिरुमला में स्थायी रूप से स्थापित होने तक पहुंचती है।
मां लक्ष्मी का वैकुंठ छोड़ना, भगवान विष्णु का श्रीनिवास के रूप में पृथ्वी पर आना, गाय द्वारा भगवान को दूध पिलाना, वराह स्वामी से भूमि प्राप्त करना, वकुला देवी का मातृत्व, पद्मावती का जन्म, श्रीनिवास और पद्मावती का विवाह और अंत में भगवान का पाषाण स्वरूप धारण करना—इन सभी घटनाओं को एक ही दिव्य लीला का हिस्सा माना जाता है।
आज तिरुमला की पहाड़ियों पर जब करोड़ों भक्त भगवान वेंकटेश्वर के सामने खड़े होकर कहते हैं—
“गोविंदा… गोविंदा…”
तो उनके पीछे केवल एक नाम नहीं होता।
उसके पीछे सदियों पुरानी आस्था, भक्ति और भगवान के पृथ्वी पर निवास करने की यह अद्भुत कथा होती है।
कहा जाता है कि भगवान दूर नहीं हैं।
जरूरत सिर्फ इतनी है कि मन सच्चा हो और पुकार दिल से निकले।
गोविंदा! गोविंदा! 🙏
श्री वेंकटेश्वर भगवान की जय।
श्री पद्मावती माता की जय।