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महाभारत का युद्ध केवल दो सेनाओं के बीच लड़ा गया युद्ध नहीं था। यह ऐसी दिव्य लीला थी, जिसमें एक-एक दिन के पीछे कोई न कोई रहस्य छिपा हुआ था।
कौरवों की विशाल सेना थी। उनके पास बड़े-बड़े महारथी थे। दूसरी ओर पांडवों की सेना तुलनात्मक रूप से छोटी थी। लेकिन पांडवों के साथ स्वयं द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण थे।
श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा ली थी। वे अर्जुन के सारथी बने थे।
लेकिन युद्ध के दसवें दिन एक ऐसी घटना घटने वाली थी, जिसने श्रीकृष्ण की इस प्रतिज्ञा को ही चुनौती दे दी।
और इस पूरी लीला के केंद्र में थे — भीष्म पितामह।
महाभारत युद्ध के दस दिन बाद दुर्योधन हुआ परेशान
महाभारत का युद्ध चलते-चलते दस दिन बीत चुके थे।
कौरवों की सेना लगातार कम होती जा रही थी। दुर्योधन को यह बात अंदर से परेशान कर रही थी।
एक दिन वह भीष्म पितामह के पास पहुंचा और उनसे कहने लगा—
“पितामह! आप हमारा अन्न खाते हैं, लेकिन भला पांडवों का चाहते हैं।”
भीष्म पितामह ने दुर्योधन की बात सुनी और बोले—
“यह क्या बोल रहे हो?”
दुर्योधन ने कहा—
“सही तो बोल रहा हूं। हमारे पास इतने बड़े-बड़े योद्धा हैं, फिर भी हमारी सेना घटती जा रही है। पांडवों की सेना हमसे छोटी है, फिर भी वे लगातार आगे बढ़ रहे हैं।”
“युद्ध को दस दिन हो गए हैं। अभी तक हम कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं कर पाए। आखिर आप कर क्या रहे हैं?”
भीष्म पितामह को दुर्योधन की यह बात चुभ गई।
उन्होंने कहा—
“तू हमें ललकारता है?”
दुर्योधन बोला—
“मैं तो केवल अपनी चिंता बता रहा हूं।”
तब भीष्म पितामह ने कहा—
“आज रात अपनी पत्नी को मेरे पास भेजना।”
दुर्योधन ने पूछा—
“क्यों?”
भीष्म पितामह बोले—
“जब मैं संध्या की पूजा और अपना नियम पूरा करके उठूंगा, तब तेरी पत्नी आकर मुझे प्रणाम करेगी। मैं उसे अपने संपूर्ण जीवन की तपस्या का फल दूंगा।”
“मैं उसे आशीर्वाद दूंगा — अखंड सौभाग्यवती भव।”
फिर उन्होंने दुर्योधन से कहा—
“मरने का बहुत डर है ना तुझे? चिंता मत कर। तू नहीं मरेगा। अपनी पत्नी को आज रात मेरे पास भेज देना।”
दुर्योधन यह सुनकर प्रसन्न हो गया।
उसने कहा—
“मैं तो यही चाहता था पितामह। आप थोड़े शांत दिखाई दे रहे थे। अब आप उत्तेजित हुए हैं। बस ऐसे ही रहिए। मेरी पत्नी भानुमती आज रात आपके पास आकर आशीर्वाद लेगी।”
भीष्म पितामह बोले—
“भेज देना।”
लेकिन यह बात श्रीकृष्ण ने सुन ली
दुर्योधन और भीष्म पितामह के बीच हुई यह बातचीत दूर खड़े श्रीकृष्ण ने सुन ली।
अब श्रीकृष्ण सोचने लगे—
यदि भानुमती ने भीष्म पितामह से अखंड सौभाग्यवती भव का आशीर्वाद ले लिया, तो परिस्थिति बदल सकती है।
भीष्म पितामह कोई साधारण योद्धा नहीं थे।
उनके सामने बड़े-बड़े योद्धा टिक नहीं पा रहे थे।
श्रीकृष्ण जानते थे कि उन्हें अपनी लीला से इस परिस्थिति का समाधान करना होगा।
तब उन्होंने एक योजना बनाई।
किसी भी तरह भानुमती से पहले द्रौपदी को भीष्म पितामह के पास पहुंचाना था।
क्योंकि यदि द्रौपदी को भीष्म पितामह ने अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दे दिया, तो उसके पांचों पतियों की रक्षा का प्रश्न सामने आ जाएगा।
और यही हुआ।
आधी रात को श्रीकृष्ण पहुंचे द्रौपदी के पास
रात का समय था।
द्रौपदी सो रही थीं।
श्रीकृष्ण उनके पास पहुंचे और उन्हें जगाया।
उन्होंने कहा—
“उठो। लंबा घूंघट कर लो।”
द्रौपदी ने घूंघट कर लिया।
श्रीकृष्ण ने कहा—
“मेरे साथ चलो।”
द्रौपदी चलने लगीं, लेकिन रास्ते में बार-बार लड़खड़ा रही थीं।
श्रीकृष्ण ने पूछा—
“क्या हुआ? चल क्यों नहीं पा रही हो?”
द्रौपदी ने कहा—
“माधव, मेरी जूतियां हैं। इनसे मैं ठीक से चल नहीं पा रही।”
श्रीकृष्ण ने तुरंत उनकी दोनों जूतियां उतार दीं।
एक जूती एक ओर और दूसरी दूसरी ओर लगाकर उन्होंने द्रौपदी से कहा—
“अब मेरे साथ चलो।”
आधी रात का समय था।
द्रौपदी को समझ नहीं आ रहा था कि श्रीकृष्ण उन्हें लेकर कहां जा रहे हैं।
उन्होंने पूछा—
“नाथ, इतनी रात को हम कहां जा रहे हैं?”
श्रीकृष्ण बोले—
“तुम्हें भीष्म पितामह से आशीर्वाद दिलाना है।”
द्रौपदी चौंक गईं।
श्रीकृष्ण ने कहा—
“भानुमती वहां पहुंचे, उससे पहले तुम्हें वहां पहुंचना होगा।”
फिर श्रीकृष्ण ने समझाया—
“तुम भीतर जाना। घूंघट में रहना। कुछ बोलना नहीं। भीष्म पितामह पूजा पूरी करके हाथ में जल लेंगे और तुम्हारे सिर पर जल डालकर तुम्हें आशीर्वाद देंगे। आशीर्वाद लेकर तुरंत बाहर आ जाना।”
“यदि वह पूछें कि तुम कैसे आईं, तो कुछ भी कह देना, लेकिन मेरा नाम मत लेना।”
श्रीकृष्ण ने बदला अपना रूप
श्रीकृष्ण ने अपना रूप भी बदल लिया।
उन्होंने सिर पर साफा बांधा, आंखों में काजल लगाया और अपना स्वरूप ऐसा बना लिया कि कोई आसानी से पहचान न सके।
दूसरी ओर द्रौपदी भी लंबा घूंघट करके भीष्म पितामह के शिविर की ओर चली गईं।
भीष्म पितामह अपनी पूजा में बैठे थे।
द्रौपदी अंदर पहुंचीं।
जैसे ही उनके नूपुरों की आवाज सुनाई दी, भीष्म पितामह ने समझ लिया कि भानुमती आ गई हैं।
द्रौपदी ने जाकर प्रणाम किया।
भीष्म पितामह ने कहा—
“आ गई तुम?”
उन्होंने हाथ में जल लिया।
पूजा के बाद अपने संपूर्ण जीवन की तपस्या का फल देते हुए उन्होंने आशीर्वाद दिया—
“अखंड सौभाग्यवती भव।”
द्रौपदी ने सुना तो चौंक गईं
द्रौपदी ने सोचा था कि भीष्म पितामह शायद कोई सामान्य आशीर्वाद देंगे।
लेकिन उन्होंने तो उन्हें अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दे दिया।
द्रौपदी के मन में विचार आया—
“जिनके पीछे धनुष-बाण लेकर मेरे पति पांडवों को मारने के लिए दौड़ते हैं, वही आज मुझे अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दे रहे हैं!”
द्रौपदी ने तुरंत अपना घूंघट उठा दिया।
भीष्म पितामह ने जैसे ही देखा, वे चौंक गए।
उन्होंने कहा—
“द्रौपदी! मैंने तो भानुमती को बुलाया था। तुम यहां कैसे?”
द्रौपदी बोलीं—
“पितामह, भानुमती आपकी पुत्रवधू हैं तो मैं भी तो आपकी पुत्रवधू हूं। आपने मुझे आशीर्वाद दिया है। इसमें मेरी क्या गलती है?”
भीष्म पितामह के नेत्र सजल हो गए।
उन्होंने कहा—
“हो सोई जो राम रची राखा।”
अर्थात जो श्रीराम की इच्छा है, वही होकर रहेगा।
लेकिन तभी भीष्म पितामह ने द्रौपदी से एक और सवाल कर दिया।
भीष्म पितामह ने पूछ लिया — तुम्हें कैसे पता?
भीष्म पितामह ने गंभीर होकर पूछा—
“द्रौपदी, तुझे कैसे पता कि मैं भानुमती को आशीर्वाद देने वाला था?”
“इतनी रात को तू यहां कैसे आई?”
“अकेली आई है या कोई लेकर आया है?”
द्रौपदी थोड़ा लड़खड़ाने लगीं।
भीष्म पितामह समझ गए कि बात कुछ और है।
द्रौपदी बोली—
“नहीं… नहीं… मैं अकेली आई हूं।”
फिर भीष्म पितामह ने पूछा—
“कोई आया है?”
द्रौपदी बोली—
“आया तो है… लेकिन वैसे कोई नहीं आया।”
अब भीष्म पितामह बोले—
“जल्दी बता कौन आया है?”
द्रौपदी ने कहा—
“गोपाल भैया।”
भीष्म पितामह ने पूछा—
“कौन गोपाल भैया?”
द्रौपदी बोलीं—
“हमारी गौशाला में गायों का दूध निकालने वाला था। एक दिन वह रो रहा था, तब मैंने उसे राखी बांध दी थी। तभी से वह मेरा भाई है।”
भीष्म पितामह बोले—
“अच्छा! चल, मुझे दिखा कि कैसा है तेरा गोपाल भैया।”
श्रीकृष्ण की पहचान खुल गई
भीष्म पितामह बाहर आए और जोर से पुकारा—
“गोपाल भैया!”
दूर बैठे श्रीकृष्ण ने यह आवाज सुनी।
वह समझ गए कि द्रौपदी ने सब बता दिया है।
श्रीकृष्ण मन ही मन मुस्कुराए।
भीष्म पितामह ने फिर पुकारा—
“गोपाल भैया! सामने आओ।”
श्रीकृष्ण उनके सामने पहुंचे।
अंधेरी रात थी।
भीष्म पितामह ने लालटेन उठाई और श्रीकृष्ण का चेहरा देखने लगे।
उन्होंने कहा—
“जरा अपना चेहरा दिखाओ।”
श्रीकृष्ण ने अपना रूप बदल रखा था।
सिर पर बड़ी पगड़ी थी और चेहरे पर काजल।
भीष्म पितामह बोले—
“अपनी पगड़ी हटाओ।”
श्रीकृष्ण बोले—
“नहीं, पगड़ी नहीं हटाएंगे।”
भीष्म पितामह ने फिर कहा—
“हटाओ।”
जैसे ही पगड़ी हटाई गई, श्रीकृष्ण के घुंघराले केश दिखाई दिए।
उनके भीतर छिपा मोरपंख भी दिखाई दे गया।
अब श्रीकृष्ण का वास्तविक स्वरूप सामने था।
भीष्म पितामह के नेत्र प्रेम से भर गए।
उन्होंने कहा—
“छलिया! कपटी! यह क्या करते हो तुम?”
फिर वे बोले—
“मान गए तुम्हें कन्हैया। तुमने भानुमती को द्रौपदी में परिवर्तित कर दिया और उसे अखंड सौभाग्यवती का आशीर्वाद भी दिलवा दिया।”
भीष्म पितामह ने द्रौपदी को दी जिम्मेदारी
भीष्म पितामह ने द्रौपदी से कहा—
“मैंने तुम्हें आशीर्वाद दिया है — अखंड सौभाग्यवती भव।”
“लेकिन अब इसकी जिम्मेदारी भी तुम्हारी है।”
“पांचों में से एक का भी बाल बांका नहीं होना चाहिए।”
“यदि किसी को खरोंच भी आती है, तो मुझसे मत कहना। इनके पास जाना, क्योंकि जिम्मेदारी मैंने इन्हें दी है।”
यह बात सुनकर श्रीकृष्ण समझ गए कि भीष्म पितामह ने भी अपनी लीला शुरू कर दी है।
फिर भीष्म पितामह ने श्रीकृष्ण से कहा—
“द्वारिकाधीश! कल से मैं महाभारत का मुख्य योद्धा बनकर आऊंगा। देखता हूं कि तुम पांडवों को कैसे बचाते हो।”
श्रीकृष्ण मुस्कुराए।
लेकिन उनके सामने अब एक नई चुनौती थी।
श्रीकृष्ण ने प्रतिज्ञा ली थी कि वे महाभारत युद्ध में शस्त्र नहीं उठाएंगे।
और भीष्म पितामह ने जैसे ठान लिया था कि श्रीकृष्ण से उनकी प्रतिज्ञा जरूर तुड़वाएंगे।
अगले दिन भीष्म पितामह का भयंकर रूप
अगले दिन युद्धभूमि में भीष्म पितामह ने अपना धनुष उठाया।
उनका लक्ष्य केवल एक था—
अर्जुन।
उन्होंने ऐसा भयंकर युद्ध किया कि अर्जुन के रथ को बार-बार दिशा बदलनी पड़ी।
श्रीकृष्ण कभी रथ को इधर ले जाते, कभी उधर।
घोड़ों के पैरों से धूल उड़ रही थी।
घोड़ों का पसीना श्रीकृष्ण के शरीर पर पड़ रहा था।
रथ चलाते-चलाते श्रीकृष्ण स्वयं पसीने से भीग गए।
भीष्म पितामह लगातार बाणों की वर्षा कर रहे थे।
अर्जुन को बचाते हुए श्रीकृष्ण ने कहा—
“पितामह, थोड़ा रुक जाइए।”
लेकिन भीष्म पितामह बोले—
“आज नहीं छोड़ूंगा।”
भीष्म ने ऐसा बाण चलाया जिसे कोई रोक नहीं सकता था
अंततः भीष्म पितामह ने एक ऐसा बाण चलाने का निर्णय किया, जिसे मंत्र और संकल्प के साथ छोड़ा गया था।
वह बाण अर्जुन को लगना ही था।
श्रीकृष्ण ने जब उस बाण का मंत्र सुना तो समझ गए—
“यह बाण चाहे मैं रथ को कहीं भी ले जाऊं, अर्जुन तक पहुंचेगा।”
अब श्रीकृष्ण के सामने केवल एक रास्ता था।
उन्होंने सामने देखा।
वहां रथ का एक टूटा हुआ चक्का पड़ा था।
श्रीकृष्ण ने सोचा—
“अब मुझे कुछ करना पड़ेगा।”
श्रीकृष्ण ने उठा लिया रथ का चक्का
जैसे ही भीष्म पितामह बाण छोड़ने वाले थे, श्रीकृष्ण अचानक रथ से नीचे कूद गए।
उन्होंने रथ का चक्का उठाया।
और भीष्म पितामह की ओर दौड़ पड़े।
जो कोमल और सुंदर श्रीकृष्ण थे, वही उस समय मानो नरसिंह के समान दिखाई देने लगे।
उनकी आंखें लाल हो गईं।
उनका स्वरूप उग्र हो गया।
धरती कांपने लगी।
आकाश में बादल गरजने लगे।
ऐसा लगा जैसे कोई नई प्रलय आने वाली हो।
श्रीकृष्ण रथ का चक्का लेकर भीष्म पितामह की ओर दौड़ रहे थे।
भीष्म पितामह क्यों प्रसन्न हो गए?
भीष्म पितामह ने जैसे ही देखा कि श्रीकृष्ण स्वयं रथ का चक्का लेकर उनकी ओर दौड़ रहे हैं, उन्होंने अपना धनुष नीचे रख दिया।
और वे प्रसन्न होकर ताली बजाने लगे।
उन्होंने कहा—
“हे कृष्ण! आपने प्रतिज्ञा ली थी कि महाभारत युद्ध में शस्त्र नहीं उठाएंगे।”
“लेकिन आज आपने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी।”
भीष्म पितामह के लिए यह पराजय नहीं थी।
यह तो उनकी सबसे बड़ी इच्छा की पूर्ति थी।
वे चाहते थे कि युद्धभूमि में श्रीकृष्ण उनके सामने उसी दिव्य रूप में प्रकट हों।
उन्होंने कहा—
“कृष्ण! आगे से कभी प्रतिज्ञा लेना तो याद रखना कि यहां भीष्म बैठा है।”
“तुम्हारी प्रतिज्ञा तुड़वाने के लिए।”
श्रीकृष्ण ने अपनी प्रतिज्ञा क्यों तोड़ी?
श्रीकृष्ण ने रथ का चक्का दूर फेंक दिया।
उन्होंने अपने हाथ झाड़े और मुस्कुराए।
फिर उन्होंने भीष्म पितामह से कहा—
“पितामह, मैंने अपनी प्रतिज्ञा किसलिए तोड़ी?”
“क्योंकि आपने भी एक प्रतिज्ञा ली थी।”
भीष्म पितामह ने पूछा—
“कौन-सी प्रतिज्ञा?”
श्रीकृष्ण बोले—
“आपने प्रतिज्ञा ली थी कि यदि वासुदेव कृष्ण के हाथ में आपने शस्त्र नहीं धारण कराया, तो आप स्वयं को धन्य नहीं मानेंगे।”
कथा के भाव के अनुसार श्रीकृष्ण का संकेत था कि यदि वे शस्त्र नहीं उठाते, तो भीष्म पितामह को वह दिव्य दर्शन कैसे मिलता?
यदि श्रीकृष्ण शस्त्र न उठाते, तो भीष्म पितामह की वह इच्छा कैसे पूरी होती?
इसलिए श्रीकृष्ण ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ी।
लेकिन वास्तव में यह केवल प्रतिज्ञा तोड़ना नहीं था।
यह अपने भक्त की इच्छा पूरी करना था।
भक्त और भगवान के रिश्ते की अद्भुत लीला
महाभारत का यह प्रसंग एक गहरा आध्यात्मिक भाव सामने रखता है।
भगवान की प्रत्येक लीला को मनुष्य अपनी बुद्धि से समझ नहीं सकता।
कभी भगवान अपने भक्त के लिए नियम बदलते दिखाई देते हैं।
कभी अपनी प्रतिज्ञा तक तोड़ देते हैं।
और कभी ऐसा निर्णय लेते हैं, जिसका रहस्य बहुत बाद में समझ आता है।
भीष्म पितामह युद्धभूमि में कौरवों की ओर से लड़ रहे थे।
लेकिन उनके हृदय में श्रीकृष्ण के प्रति अद्भुत प्रेम था।
वे जानते थे कि श्रीकृष्ण ही परम सत्य हैं।
इसीलिए जब श्रीकृष्ण हाथ में रथ का चक्का लेकर उनकी ओर दौड़े, तो भीष्म पितामह के लिए वह भय का नहीं, बल्कि आनंद का क्षण था।
उन्हें वही चाहिए था—
युद्धभूमि में श्रीकृष्ण का दर्शन।
इस कथा से क्या सीख मिलती है?
इस पूरी कथा का सबसे सुंदर भाव यही है कि भगवान की लीला को केवल बाहरी घटनाओं से नहीं समझा जा सकता।
दुर्योधन ने सोचा कि भीष्म पितामह के आशीर्वाद से वह बच जाएगा।
भीष्म पितामह ने सोचा कि वे अपना धर्म निभाते हुए युद्ध करेंगे।
द्रौपदी को लगा कि वह अपने पतियों के सबसे बड़े शत्रु से आशीर्वाद ले रही है।
और श्रीकृष्ण ने सबके बीच ऐसी लीला रची कि परिस्थिति ही बदल गई।
फिर अगले दिन भीष्म पितामह ने ऐसा युद्ध किया कि श्रीकृष्ण को स्वयं अपनी प्रतिज्ञा के सामने खड़ा होना पड़ा।
अंततः श्रीकृष्ण ने शस्त्र उठाया।
लेकिन उस शस्त्र में केवल क्रोध नहीं था।
उसमें अपने भक्त के प्रेम का सम्मान था।
इसलिए भक्त के जीवन में जब कोई परिस्थिति समझ में न आए, तब तुरंत यह नहीं सोचना चाहिए कि भगवान ने मुझे क्यों छोड़ा।
कभी-कभी भगवान की योजना हमारी समझ से बहुत बड़ी होती है।
हम नहीं जानते कि भगवान क्या सोचकर कौन-सा निर्णय ले रहे हैं।
लेकिन यदि मन में यह भाव आ जाए—
“नाथ, जो आप करेंगे, मेरी भलाई उसी में है।”
तो मनुष्य के लिए हर परिस्थिति में आशा बनी रहती है।
निष्कर्ष
महाभारत के इस प्रसंग में श्रीकृष्ण की लीला कई स्तरों पर दिखाई देती है।
एक ओर दुर्योधन की चिंता है।
दूसरी ओर भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा है।
द्रौपदी को मिला अखंड सौभाग्यवती का आशीर्वाद है।
और अंत में श्रीकृष्ण का वह अद्भुत स्वरूप है, जब वे अर्जुन की रक्षा के लिए रथ से उतरकर रथ का चक्का हाथ में उठा लेते हैं।
यह प्रसंग हमें याद दिलाता है कि भगवान अपने भक्तों के लिए क्या-क्या कर सकते हैं।
श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा नहीं, लेकिन उनकी लीला मानो यही समझाती है—
भगवान को अपनी प्रतिज्ञा से अधिक अपने भक्त का प्रेम प्यारा होता है।
और शायद इसी कारण महाभारत केवल युद्ध की कथा नहीं है।
यह भक्त और भगवान के बीच के प्रेम, विश्वास और समर्पण की कथा भी है।
जय श्रीकृष्ण। 🙏
जय श्री राधे। 🙏
हरि बोल। 🙏
FAQ
1. महाभारत युद्ध के दसवें दिन क्या हुआ था?
इस कथा के अनुसार दस दिन के युद्ध के बाद दुर्योधन भीष्म पितामह से कौरव सेना के लगातार घटने को लेकर नाराज हुआ और उसने भीष्म पितामह पर प्रश्न उठाए।
2. भीष्म पितामह ने दुर्योधन से क्या कहा?
कथा के अनुसार भीष्म पितामह ने दुर्योधन से अपनी पत्नी भानुमती को रात में आशीर्वाद लेने के लिए भेजने को कहा और उसे अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद देने की बात कही।
3. श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को भीष्म पितामह के पास क्यों भेजा?
कथा के अनुसार श्रीकृष्ण चाहते थे कि भानुमती से पहले द्रौपदी भीष्म पितामह से अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद प्राप्त कर ले।
4. भीष्म पितामह ने द्रौपदी को कौन-सा आशीर्वाद दिया?
भीष्म पितामह ने द्रौपदी को “अखंड सौभाग्यवती भव” का आशीर्वाद दिया।
5. श्रीकृष्ण ने महाभारत में रथ का चक्का क्यों उठाया?
कथा के अनुसार जब भीष्म पितामह का बाण अर्जुन के लिए अत्यंत घातक परिस्थिति पैदा करने वाला था, तब श्रीकृष्ण अर्जुन की रक्षा के लिए रथ से उतरे और रथ का चक्का उठा लिया।
6. क्या श्रीकृष्ण ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ी थी?
इस कथा के अनुसार श्रीकृष्ण ने अर्जुन की रक्षा और भीष्म पितामह की इच्छा पूरी करने के लिए शस्त्र उठाने जैसी स्थिति स्वीकार की। यही इस प्रसंग की सबसे भावपूर्ण लीला मानी जाती है।
7. भीष्म पितामह श्रीकृष्ण को देखकर प्रसन्न क्यों हुए?
कथा के अनुसार भीष्म पितामह की इच्छा थी कि श्रीकृष्ण उनके सामने अपने दिव्य रूप में प्रकट हों। इसलिए जब श्रीकृष्ण रथ का चक्का लेकर उनकी ओर दौड़े, तो वे प्रसन्न हो गए।